Cloud seeding in Delhi: ज़हरीली हवा से राहत की उम्मीद, दिल्ली में पहली बार बरसेगी ‘कृत्रिम बारिश’, क्लाउड सीडिंग ट्रायल सफल
देश की राजधानी दिल्ली में दिवाली के बाद से प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। हवा की गुणवत्ता लगातार बिगड़ती जा रही है। जिससे राजधानी के लोग जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार ने प्रदूषण से निपटने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है-क्लाउड सीडिंग के जरिए कृत्रिम बारिश कराने की तैयारी पूरी हो चुकी है।
बुराड़ी में सफल हुआ क्लाउड सीडिंग ट्रायल
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने गुरुवार को घोषणा की कि दिल्ली में पहली बार वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से कृत्रिम बारिश कराई जाएगी। इसका सफल ट्रायल बुराड़ी क्षेत्र में किया गया है। जिसमें IIT कानपुर की टीम ने दिल्ली सरकार और मौसम विभाग (IMD) के सहयोग से ट्रायल फ्लाइट संचालित की। इस ट्रायल फ्लाइट ने IIT कानपुर – मेरठ – खेकड़ा – बुराड़ी – सादकपुर – भोजपुर – अलीगढ़ – कानपुर मार्ग कवर किया। इस दौरान खेकड़ा और बुराड़ी के बीच फ्लेयर्स (silver iodide और sodium chloride) छोड़े गए ताकि बादलों के व्यवहार और तकनीकी उपकरणों की तैयारी का परीक्षण हो सके। अगर मौसम ने साथ दिया, तो 29 अक्टूबर को राजधानी में ‘वैज्ञानिक बारिश’ देखने को मिलेगी।
दिल्ली में प्रदूषण खतरनाक स्तर पर
दिल्ली की हवा इन दिनों जहरीली हो चुकी है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के अनुसार, गुरुवार को दिल्ली का औसत AQI 322 दर्ज किया गया, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आता है।
शहर के कई इलाकों में हवा की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है —
क्षेत्र AQI स्तर श्रेणी
अलीपुर 205 खराब
द्वारका 196 खराब
नरेला 203 खराब
गुरुग्राम 231 बहुत खराब
नोएडा सेक्टर 116 227 बहुत खराब
लोनी, गाजियाबाद 235 बहुत खराब
विशेषज्ञों का कहना है कि स्मॉग, पराली जलाने और वाहनों से निकलने वाले धुएं ने दिल्ली की हवा को और भी जहरीला बना दिया है। इसी के चलते सरकार ने क्लाउड सीडिंग यानी कृत्रिम बारिश का विकल्प चुना है ताकि हवा में मौजूद धूल और प्रदूषक कण नीचे बैठ सकें।
28 से 30 अक्टूबर के बीच बारिश की संभावना
28, 29 और 30 अक्टूबर को दिल्ली और आसपास के इलाकों में बादल छाए रहने की संभावना है। अगर मौसम अनुकूल रहा तो 29 अक्टूबर को दिल्ली में पहली बार कृत्रिम बारिश कराई जाएगी। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह प्रक्रिया केवल तभी संभव होती है जब आकाश में पर्याप्त बादल हों। पहले आता है ‘क्लाउड’, फिर ‘सीडिंग’। मौसम वैज्ञानिक स्थिति पर लगातार नजर रख रहे हैं ताकि सही समय पर प्रक्रिया शुरू की जा सके।
क्लाउड सीडिंग क्या है?
क्लाउड सीडिंग एक वैज्ञानिक तकनीक है जिसके तहत बादलों में ऐसे रसायन छोड़े जाते हैं जो नमी को आकर्षित करके वर्षा की संभावना बढ़ाते हैं। आम तौर पर जब बादलों में मौजूद जलकण भारी हो जाते हैं, तो वे बरसात के रूप में नीचे गिरते हैं। लेकिन जब यह प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से नहीं होती, तब वैज्ञानिक तरीके से इसमें हस्तक्षेप किया जाता है। क्लाउड सीडिंग में सिल्वर आयोडाइड, ड्राई आइस, या सोडियम क्लोराइड जैसे रसायन हवाई जहाज से बादलों में छोड़े जाते हैं। ये रसायन बादलों के अंदर सूक्ष्म जलकणों को जोड़कर बड़े कणों में बदल देते हैं, जिससे बारिश होती है। यह तकनीक सूखे इलाकों में बारिश लाने, ओले रोकने या प्रदूषण कम करने के लिए भी इस्तेमाल की जाती है।
भारत में कब-कब हुई कृत्रिम बारिश?
भारत में क्लाउड सीडिंग का प्रयोग नया नहीं है, इससे पहले-
• 1984 में पहली बार तमिलनाडु में सूखे से निपटने के लिए यह प्रयोग किया गया था।
• 1984-87 और 1993-94 के बीच दो बार बड़े स्तर पर प्रयास हुए।
• 2003 और 2004 में कर्नाटक और महाराष्ट्र ने भी क्लाउड सीडिंग करवाई थी।
• 2019 में महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में बारिश की कमी के कारण सरकार ने फिर से इसका उपयोग किया।
अब दिल्ली पहली राजधानी बनने जा रही है जो प्रदूषण नियंत्रण के लिए इस तकनीक का प्रयोग करेगी।
ट्रायल फ्लाइट का वैज्ञानिक उद्देश्य
दिल्ली में हुई यह उड़ान सिर्फ तकनीकी परीक्षण नहीं थी, बल्कि एक बहु-एजेंसी समन्वय का उदाहरण भी थी। IIT कानपुर के वैज्ञानिकों, IMD और IITM पुणे के विशेषज्ञों ने मिलकर इस ट्रायल को डिजाइन किया। इस ट्रायल का उद्देश्य था, क्लाउड सीडिंग फ्लेयर्स की क्षमता और कार्यक्षमता की जांच करना। विमान की उड़ान क्षमता और उपकरणों की फिटिंग का परीक्षण करना औरविभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय की तैयारी करना। इसके साथ ही बादलों के गठन और उनके भौतिक व्यवहार का अध्ययन भी शामिल था। कृत्रिम वर्षा ट्रायल उड़ान करीब चार घंटे तक चली और तकनीकी तौर पर हर पैरामीटर पर सफल रही।
DGCA से मिली मंजूरी, IIT का विमान होगा उपयोग
नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने इस परियोजना को 1 अक्टूबर से 30 नवंबर तक मंजूरी दी है। इसके तहत IIT कानपुर के Cessna 206-H (VT-IIT) विमान को इस कार्य के लिए अधिकृत किया गया है। यह विमान Visual Flight Rules (VFR) के तहत उड़ान भरेगा और हर उड़ान के दौरान सुरक्षा व वायु यातायात नियंत्रण (ATC) नियमों का पालन किया जाएगा। परियोजना को 23 सरकारी विभागों की स्वीकृति भी मिल चुकी है।
दिल्ली सरकार और IIT कानपुर की संयुक्त पहल
यह पूरा प्रोजेक्ट दिल्ली सरकार, IIT कानपुर, IMD, और IITM पुणे का संयुक्त प्रयास है। दोनों संस्थानों के बीच पिछले महीने MoU (समझौता ज्ञापन) साइन किया गया था, जिसके तहत पांच प्रायोगिक क्लाउड सीडिंग ट्रायल किए जाएंगे। इन ट्रायल्स का मुख्य फोकस उत्तर-पश्चिम दिल्ली के प्रदूषण प्रभावित क्षेत्रों पर रहेगा।
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा,
“यह पहल न केवल तकनीकी दृष्टि से ऐतिहासिक है बल्कि दिल्ली में प्रदूषण से निपटने का वैज्ञानिक तरीका भी स्थापित करेगी। सरकार का उद्देश्य इस नवाचार के ज़रिए राजधानी की हवा को स्वच्छ और पर्यावरण को संतुलित बनाना है।”
प्रदूषण नियंत्रण के अन्य प्रयास
क्लाउड सीडिंग के साथ-साथ सरकार ने जमीनी स्तर पर भी कई कदम उठाए हैं —
• 70 नई एंटी-स्मॉग गन लगाई जा रही हैं।
• 70 मैकेनाइज्ड रोड स्वीपर्स को सड़कों की धूल कम करने के लिए तैनात किया गया है।
• 140 लिटर पिकर्स दिल्ली की 1440 किलोमीटर सड़कों पर सक्रिय रहेंगे।
• ‘ग्रीन वॉर रूम’ के माध्यम से 13 प्रदूषण हॉटस्पॉट्स पर निगरानी बढ़ाई गई है।
कृत्रिम बारिश से क्या होगा फायदा?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो दिल्ली को कुछ दिनों के लिए प्रदूषण से राहत मिल सकती है। कृत्रिम बारिश के बाद हवा में मौजूद PM2.5 और PM10 कण नीचे बैठ जाएंगे, जिससे वायु गुणवत्ता में सुधार आएगा। इसके अलावा यह प्रक्रिया दिल्ली की हवा में नमी बढ़ाकर स्मॉग की मोटाई को कम कर सकती है। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, अगर क्लाउड सीडिंग से 3 से 4 मिमी तक भी बारिश होती है, तो प्रदूषण में 25-30% तक गिरावट संभव है।
आगे की राह
अगर 29 अक्टूबर को मौसम ने साथ दिया और कृत्रिम बारिश सफल रही, तो यह भारत के लिए एक नई दिशा तय करेगा। सरकार इस परियोजना को नियमित रूप से प्रदूषण के मौसम (अक्टूबर-नवंबर) में लागू करने पर विचार कर रही है। IIT कानपुर के वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में यह तकनीक दिल्ली, मुंबई, लखनऊ और कोलकाता जैसे शहरों में भी उपयोगी साबित हो सकती है।
निष्कर्ष
दिल्ली अब प्रदूषण से जंग में विज्ञान की मदद लेने जा रही है। 29 अक्टूबर को अगर कृत्रिम बारिश होती है, तो यह न केवल दिल्ली के लिए बल्कि पूरे देश के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी। क्लाउड सीडिंग जैसी वैज्ञानिक पहलें यह दिखाती हैं कि जब पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने की बात आती है, तो तकनीक और विज्ञान ही सबसे बड़ा हथियार हो सकते हैं।







