[Hindi] पोलैंड में जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन सम्पन्न; पेरिस समझौते को लागू करने पर सहमति

Climate summit in Poland in-News UN 600

Updated on December 18 at 03:00 PM: पोलैंड में जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन सम्पन्न; पेरिस समझौते को लागू करने पर सहमति

जलवायु परिवर्तन पर पोलैंड के कातोवित्स में आयोजित सम्मेलन दो हफ्तों के गहन विचार-विमर्श और राजनीतिक विरोधों-प्रतिरोधों के बीच आखिरकार सम्पन्न हो गया। पेरिस जलवायु समझौते को लागू करने के लिए नियमावली पर सहमति बन गई है। 2015 में हुए ऐतिहासिक पेरिस समझौते का लक्ष्य बढ़ते वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे ही नियंत्रित करना था।

इन सब के बीच वैज्ञानिक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि दुनियाभर के देश ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए अपेक्षित प्रयास नहीं कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल यानि आईपीसीसी के मुताबिक वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक नियंत्रित करना संभव है। लेकिन इसके लिए जैव ईंधन के इस्तेमाल को बंद करना होगा, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव भी आएगा।

जबकि रूस, सऊदी अरब, कुवैत और अमरीका जैसे तेल निर्यातक देशों के कड़े विरोध के चलते आईपीसीसी के सुझावों को कातोवित्स नियमावली में शामिल नहीं किया जा सका। सम्मेलन के पूर्ण सत्र में भारत की तरफ से विधि, न्याय एवं सूचना तकनीकि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने वैश्विक स्टॉक-टेक के मामले में समानता के तरीकों पर कड़ा रुख अपनाया।

कार्बन क्रेडिट के मामले को किस तरह क्रियान्वित किया जाएगा, यह भी असहमति का एक बड़ा मुद्दा है, जो ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के उपायों के लिए पैसा जुटाने का एक प्रभावी तरीका हो सकता है। कार्बन उत्सर्जन के व्यापार के बाज़ार तंत्र का नियंत्रण अगली सीओपी-25 बैठक के लिए टाल दिया गया, जो सितंबर 2019 में प्रस्तावित है। ऐसा माना जा रहा है कि नया बाज़ार तंत्र विभिन्न देशों द्वारा उपायों को अपनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

कातोवित्स सम्मेलन में एक चिंताजनक तथ्य उभर कर सामने आया, जिसमें ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017 की तुलना में इस बार 2 प्रतिशत अधिक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन हुआ है। इसमें सबसे ज़्यादा बढ़ोत्तरी का रुझान चीन और अमरीका में देखा गया क्योंकि दोनों देशों में कोयले की खपत बढ़ी है।

रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन घटाकर 53 से 56 गीगा टन तक लाया जा सकता है। लेकिन तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर ना बढ़ने देने के लिए उत्सर्जन को और कम करके 24 गीगा टन तक लाये जाने की ज़रूरत होगी।

कातोवित्स सम्मेलन में एक महत्वपूर्ण सहमति बनी कि सभी देश ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन और उसे कम करने के प्रयास की रिपोर्ट तैयार करेंगे है। इसके अलावा अल्प विकसित देशों को आश्वस्त किया गया कि उन्हें ग्लोबल वार्मिंग के कारण आ रहे बदलावों से निपटने और उत्सर्जन कम करने के लिए आर्थिक सहायता मिलेगी

Published on December 03 at 04:00 PM: पेरिस जलवायु समझौते को अमली जमा पहनाने के लिए पोलैंड में जुटे दुनियाभर के देश; अमरीका अब भी अड़ा

जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती संख्या जैसे कई मुद्दे हैं जिन पर दुनिया भर के देश चिंतित हैं और इन मुद्दों को हल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे वैश्विक संस्थान प्रयासरत भी हैं। पृथ्वी को बचाने के उद्देश्य से 2015 में पेरिस समझौता हुआ था जिससे उम्मीद जगी थी कि दुनिया के सभी देश गंभीर कदम उठाएंगे। लेकिन अमरीका के राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प ने पेरिस जलवायु समझौते से पीछे हटने का फैसला कर पूरी दुनिया को चौंका दिया था। उनके इस कदम से दुनिया भर में फिर से चिंता बढ़ गई थी।

इस बीच एक बार फिर से दुनिया भर के कई देश पेरिस समझौते में बनी सहमति को अमल में लाने के लिए एकजुट हुए हैं। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्‍त राष्‍ट्र कन्‍वेशन के भागीदार देशों की 24वीं बैठक 2 दिसम्बर से पोलैंड के कोतोवित्‍स में शुरू हुई। यह सम्‍मेलन 14 दिसम्‍बर तक चलेगा, जिसमें सभी देश पेरिस समझौते को लागू करने पर चर्चा करेंगे।

 

सम्‍मेलन में भारत का प्रतिनिधित्‍व केन्‍द्रीय पर्यावरण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन कर रहे हैं। उन्‍होंने उम्‍मीद जताई है कि सम्‍मेलन में पेरिस जलवायु समझौते को लागू करने के बारे में आवश्‍यक दिशा-निर्देंश मूर्त रूप से लकेंगे। उन्‍होंने कहा कि यह देखना जरूरी है कि सम्‍मेलन में लिए गये फैसले पेरिस समझौते की व्‍यवस्‍थाओं और सिद्धांतों के अनुरूप हों। सम्‍मेलन के अवसर पर भारत अलग से एक पवेलियन बना रहा है जिसमें जलवायु परिवर्तन के संबंध में भारत द्वारा किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी जाएगी। इस पवेलियन का विषय है - वन वर्ल्‍ड, वन सन, वन ग्रिड।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर भारत और फ्रांस ने पेरिस में 30 नवंबर 2015 को एक अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन यानि इंटरनैशनल सोलर अलायंस का गठन किया था। यह संगठन सौर ऊर्जा पर आधारित 121 देशों का एक सहयोग संगठन है। यह संगठन कर्क और मकर रेखा के बीच स्थित देशों को एक मंच पर लाएगा। ऐसे देशों में सूर्य की किरणे अधिक समय तक रहती हैं जिससे बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा का उत्पादन हो सकता है।

अमरीका को छोड़कर, जलवायु परिवर्तन संबंधी पेरिस समझौते पर, दस्‍तखत करने वाले जी-20 के अन्‍य सभी सदस्य देशों ने इस समझौते को पूरी तरह अमल में लाये जाने का संकल्‍प व्‍यक्‍त किया है। जबकि अमरीका ने फिर कहा है कि वह इस समझौते में शामिल नहीं होगा।

पर्यावरण को हो रहे नुकसान के प्रति आगाह करते हुए लगभग दो सौ देशों के प्रतिनिधि 2 दिसम्बर से पोलैंड में संयुक्‍त राष्‍ट्र जलवायु सम्‍मेलन के लिए एकजुट हो रहे हैं ताकि जलवायु परिवर्तन के दुष्‍परिणामों को रोकने की योजना को ठोस रूप दिया जा सके।

जलवायु परिवर्तन के सबसे ज्‍यादा दुष्प्रभाव झेल रहे छोटे और गरीब देश चाहते हैं कि अमीर देश 2015 के पेरिस समझौते में किए गए वायदों को पूरा करें। विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान में महज एक डिग्री की बढ़ोतरी के बावजूद जंगलों में भीषण आग लगने, लू चलने और समुद्री तूफान जैसी विनाशकारी घटनाएं बढ़ रही हैं, जो समूचे विश्व के लिए चुनौती और चिंता का कारण है।

Image credit: NewsUN

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