[Hindi] पंजाब के किसान ने धान की पराली खेतों में निपटाने की दिखाई राह

March 6, 2017 1:51 PM |

Punjab Fodder burningसर्दी के मौसम की शुरुआत होते ही दिल्ली सहित उत्तर भारत में प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुँच जाता है। इस दौरान वातावरण में नमी बढ़ने लगती है जिससे हानिकारक गैसें, धुआँ, धूल इत्यादि प्रदूषण फैलाने वाले कण हवा में नीचे ही बने रहते हैं और प्रदूषण के रूप में बुरी तरह से प्रभावित करते हैं। राजधानी दिल्ली सहित उत्तर भारत के मैदानी राज्यों में लोगों का सांस लेना दूभर हो जाता है। इस दौरान हरियाणा और पंजाब में धान की कटाई और मड़ाई शुरू होती है। उत्तर-पश्चिम भारत में स्थित इन दोनों कृषि प्रधान राज्यों में किसान धान के अवशेष को निपटान के लिए आग के हवाले कर देते हैं। इनसे उठने वाला धुआँ समूचे उत्तर भारत में काले बादल की तरह आसमान पर छा जाता है।

समस्या की गंभीरता को देखते हुए ना सिर्फ राष्ट्रीय हरित अधिकरण और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय सहित सभी संबद्ध एजेंसियां हरकत में आ जाती हैं बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत भी मामले का स्वतः संज्ञान लेकर या जनहित याचिकाओं पर दोनों राज्यों की सरकारों को मामले में सख्त कदम उठाने के निर्देश देते हैं। लेकिन हास्यास्पद तथ्य यह है कि ना तो राज्य सरकारें इसको लेकर गंभीर होती हैं और ना ही पंजाब व हरियाणा के किसानों को इससे कोई फर्क पड़ता है। परिणामस्वरूप यह कवायद मौसम चक्र की तरह की एक निश्चित प्रक्रिया बन गई है। हर वर्ष किसान पिराली के अवशेष जलाते हैं और एजेंसियां सवाल उठती हैं लेकिन होता वही है ढाख के तीन पात।

इस बीच एक प्रेरक खबर पंजाब के जालंधर से आई है। जहां के किसान भूपिंदर सिंह ने 8 साल से पिराली को जलाने की बजाए इसको खेतों में ही निपटना शुरू किया है। इसके दोहरे लाभ से वो उत्साहित हैं। भूपिंदर सिंह का कहना है कि उन्होंने इसके निपटान के लिए एक चॉपर कम स्लाइडर मशीन बनाई है जिसकी मदद से पिराली को खेतों में ही निपटते हैं। यह पिराली सड़कर बाद में जैविक खाद के रूप में फसल के लिए सबसे बेहतर और प्रकृति उर्वरक बन जाती है।

उनके इस प्रयास और नई शुरुआत को पर्यावरण के लिए काफी प्रेरणादायक माना जा रहा है। ज़रूरत है सभी किसानों में इस तरह की कार्यशैली विकसित करने की, जिससे ना सिर्फ पर्यावरण को होने वाले बड़े नुकसान से बचाया जा सके बल्कि जैविक खाद की मदद से कृषि उत्पादों की गुणवत्ता को और बेहतर किया जा सके। किसान भूपिंदर सिंह के अनुसार वह पहले जहां एक एकड़ में 7 बोरी उर्वरक डालते थे वही अब 4 बोरी उर्वरक से अच्छा उत्पादन मिल रहा है।

गौरतलब है कि इस चॉपर कम स्लाइडर मशीन को तैयार करने में 2.5 लाख का खर्च आया है जिसमें 1 लाख की सब्सिडी सरकार की तरफ से मिली है। मीडिया में आई खबरों के अनुसार किसान भूपिंदर सिंह अन्य किसानों को भी ऐसी मशीन के निर्माण और उसके इस्तेमाल के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

Image credit: Tribune India

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