जलवायु संकट और व्यापार समझौते के बीच भारतीय कृषि पर मंडराता खतरा
भारत आज एक ऐसे दौर में खड़ा है जहाँ वह अमेरिका जैसे प्रमुख वैश्विक साझेदारों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौतों की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। लेकिन इन समझौतों में कृषि, विशेष रूप से डेयरी क्षेत्र को शामिल किए जाने की आशंका ने चिंता पैदा कर दी है।
हाल ही में भारतीय किसान आंदोलन समन्वय समिति (ICCFM) ने भारत सरकार से आग्रह किया है कि वह प्रस्तावित भारत–अमेरिका व्यापार समझौते में कृषि को शामिल न करे, क्योंकि इससे खाद्य सुरक्षा, जैव-सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका पर गंभीर खतरा हो सकता है।
भारत की कृषि: जलवायु-प्रभावित और आजीविका-आधारित
भारत की कृषि प्रणाली विकसित देशों की तुलना में कहीं अधिक जलवायु पर निर्भर है। यहां का बड़ा हिस्सा मानसून, तापमान में उतार-चढ़ाव और चरम मौसमीय घटनाओं पर निर्भर करता है। अब भी लाखों किसान बारिश पर आधारित खेती करते हैं और सिंचाई जैसी बुनियादी सुविधाएं सीमित हैं।
बदलते मानसून पैटर्न, देरी से बुवाई, हीटवेव, बाढ़ और सूखे की बढ़ती घटनाएं इस क्षेत्र की असुरक्षा को और बढ़ा रही हैं। ऐसे में अगर सब्सिडी युक्त या ट्रांसजेनिक आयात को खुले बाजार में लाया गया तो इससे स्थानीय खाद्य प्रणाली, कृषि स्वावलंबन (Agricultural self-reliance) और पारिस्थितिक संतुलन (ecological balance) पर गहरा असर पड़ेगा।
वैश्विक कृषि व्यापार बनाम स्थानीय वास्तविकताएं
अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े कृषि निर्यातक देशों में से एक है, लेकिन हाल के वर्षों में उसके निर्यात में भारी गिरावट आई है। चीन, मैक्सिको और कनाडा के साथ व्यापार संघर्ष ने यह संकट और बढ़ा दिया है। अब ये देश नई बाजारों की तलाश में हैं – जिसमें भारत भी एक बड़ा लक्ष्य है।
लेकिन अमेरिकी कृषि प्रणाली को बड़ी ज़मीनों, उन्नत मशीनीकरण, और 1.5 ट्रिलियन डॉलर की सब्सिडी (2024 फ़ार्म बिल) का समर्थन प्राप्त है, जबकि भारतीय किसान सीमित संसाधनों और छोटी जोत वाली ज़मीनों पर निर्भर हैं। इस असमान मुकाबले में यदि शून्य शुल्क पर आयात की अनुमति दी गई, तो देश के करोड़ों छोटे किसानों की आजीविका संकट में पड़ सकती है।
तकनीकी विकास जैव-सुरक्षा से समझौता न करे
ICCFM ने ट्रांसजेनिक फसलों के आयात पर भी चिंता जताई है, जैसे कि ग्लाइफोसेट-प्रतिरोधी सोयाबीन और मक्का, जो भारत में न तो बोई जाती हैं और न ही खाने के लिए अनुमोदित हैं। आज जब जैव-सुरक्षा और सतत खेती की मांग तेज़ी से बढ़ रही है, ऐसे में इन उत्पादों को व्यापार समझौतों में शामिल करना गंभीर वैज्ञानिक जांच और नियामकीय निगरानी के बाद ही किया जाना चाहिए।
भारत ने WTO जैसे मंचों पर हमेशा न्यायसंगत व्यापार और स्थानीय उत्पादकों की सुरक्षा की बात की है। यही दृष्टिकोण भविष्य की व्यापार नीति में भी बना रहना चाहिए।
जलवायु-संवेदनशील नीतियों की जरूरत
एक मौसम वैज्ञानिक के रूप में, जो कृषि और एग्री-टेक से जुड़ी जलवायु प्रक्रियाओं पर वर्षों से काम कर रहा है, यह साफ है कि जलवायु परिवर्तन, वैश्विक व्यापार और स्थानीय खाद्य प्रणाली के बीच संतुलन बेहद आवश्यक है। व्यापार खुलापन, तब ही सार्थक है जब वह जलवायु लचीलापन, किसानों की भलाई और स्थानीय खाद्य व्यवस्था की मजबूती के साथ आए।
निष्कर्ष: संरक्षण नहीं, दूरदृष्टि
भारत को नए व्यापार साझेदारों की खोज जरूर करनी चाहिए, लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि इससे पहले से जलवायु संकट से जूझ रहे क्षेत्रों को नुकसान न हो। अगर कृषि को ऐसे व्यापार समझौतों से बाहर रखा जाता है जहाँ जोखिम लाभ से अधिक हो तो यह संरक्षणवाद नहीं, बल्कि विवेकशीलता होगी। जलवायु-स्मार्ट और किसान-केंद्रित नीति ही भारत की कृषि और खाद्य सुरक्षा का भविष्य सुनिश्चित कर सकती है।
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