प्राकृतिक कहर के बीच बागवानी संकट, कश्मीर अब भी PM फसल बीमा योजना से दूर
बढ़ती जलवायु आपदाओं के बावजूद, जम्मू-कश्मीर का बागवानी क्षेत्र फसल बीमा योजना से वंचित
भले ही मौसम की मार बार-बार जम्मू-कश्मीर पर पड़ रही हैं। लेकिन इसके बाद भी जम्मू-कश्मीर का बागवानी क्षेत्र, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, अभी भी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के दायरे से बाहर है। इसका नतीजा यह है कि दक्षिण कश्मीर के हजारों फल उत्पादकों (किसान) हर बार ओलावृष्टि, बर्फबारी या तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं से भारी नुकसान झेलते हैं, लेकिन उनके पास किसी तरह का बीमा या सुरक्षा व्यवस्था नहीं है।
जून की ओलावृष्टि: एक चेतावनी, पर कोई सुरक्षा कवच नहीं
2 जून को दक्षिण कश्मीर के दर्जनों बागवानी गांवों में असामान्य रूप से तेज ओलावृष्टि हुई। शोपियां के ज़ैनापोरा ब्लॉक जो एक प्रमुख सेब उत्पादक इलाका है, यहां भी चने के बराबर साइज के बड़े-बड़े ओले करीब आधे घंटे तक बगीचे (orchards) पर बरसते रहे, जिससे फल और शाखाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं।
मुआवजा तो मिला, पर बीमा कवरेज नहीं: SDRF की सीमाएँ
ओलावृष्टि के बाद, राजस्व और बागवानी विभागों ने नुकसान का सर्वे किया और राज्य आपदा मोचन कोष (SDRF) के तहत राहत देना शुरू किया। लेकिन यह मुआवजा काफी अपर्याप्त साबित हुआ। जैसे कि एक किसान 'गनी' को केवल ₹2,900 मिले। वहीं, अन्य किसानों ने ₹850 से ₹1,000 प्रति कनाल तक की राहत की जानकारी दी। जबकि एक कनाल पर सेब की खेती की लागत ₹50,000 से अधिक होती है, जिसमें पानी, कीटनाशक, वृक्ष प्रबंधन जैसे दीर्घकालिक निवेश शामिल हैं।
ऐसे में खासकर शोपियां जैसे जिलों में जहाँ 85% घर बागवानी पर निर्भर हैं, यह राहत आर्थिक स्थिरता नहीं दे पाती।
पीएम फसल बीमा योजना: कश्मीर के बागवानों के लिए अब भी दूर की बात
2016 में शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) का उद्देश्य है कि फसल उत्पादन और मौसम आधारित जोखिमों को बीमा के तहत लाया जाए। लेकिन लगभग एक दशक बाद भी, यह योजना कश्मीर की बागवानी फसलों के लिए लागू नहीं हो सकी है। कुछ जिलों में गेहूं और तेल बीजों के लिए पायलट प्रोजेक्ट्स जरूर चले पर सेब जैसे फल, जो राज्य में सालाना 2 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक पैदा होते हैं, अभी भी इस योजना से बाहर हैं।
बीमा कंपनियों की रुचि क्यों नहीं?
PMFBY या मौसम आधारित फसल बीमा योजना (WBCIS) को लागू करने के लिए कई बार निविदाएं निकाली गईं, लेकिन बीमा कंपनियों की भागीदारी बेहद कम रही। इसके पीछे मुख्य कारण हैं:
• पहाड़ी क्षेत्र की वजह से मौसम का ज्यादा जोखिम
• उपज का सही अनुमान और सत्यापन के लिए आवश्यक ढांचा नहीं
• ज़मीन रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण अधूरा
• अनुच्छेद 370 हटने के बाद प्रशासनिक अनिश्चितता
पहाड़ी कृषि के लिए चाहिए नया बीमा ढांचा
कश्मीर की सेब आधारित अर्थव्यवस्था, जिसकी सालाना कीमत लगभग ₹8,000 करोड़ है, भारत की सबसे जलवायु-संवेदनशील कृषि व्यवस्थाओं में से एक है। बागवानी फसलें सालाना नहीं, बल्कि मल्टी-ईयर (बहुवर्षीय) होती हैं। एक बार ओलावृष्टि या पाला आने पर, पेड़ों को नुकसान होता है और भविष्य की पैदावार भी प्रभावित होती है।
ऐसे में पारंपरिक बीमा मॉडल पहाड़ी और बिखरी खेती के लिए प्रभावी नहीं हैं। इसके बजाय जरूरत है:
• वेदर इंडेक्स बीमा – बारिश, ओला, पाला या तापमान आधारित ट्रिगर
• सैटेलाइट और ड्रोन आधारित नुकसान का आकलन
• छोटे भू-क्षेत्रों के हिसाब से जोनिंग और बीमा प्रीमियम निर्धारण
• रियल टाइम अलर्ट और पारदर्शी क्लेम प्रक्रिया से किसानों का भरोसा बनाना
भारत के पास तकनीक है जैसे सैटेलाइट मॉनिटरिंग और AI मॉडलिंग, बस अब जरूरत है राजनीतिक इच्छाशक्ति और संस्थागत नवाचार की।
आपदा राहत से आगे बढ़कर आपदा से पहले की तैयारी जरूरी
2 जून की ओलावृष्टि कोई अलग घटना नहीं थी, बल्कि यह बदलते जलवायु पैटर्न का हिस्सा है। जैसे अनियमित ओले, देर से पड़ने वाला पाला, बादल फटना, और असमय बर्फबारी। जब तक किसानों को संरचित जोखिम सुरक्षा (structured risk transfer) नहीं मिलती, तब तक वे बार-बार झटके सहते रहेंगे, जिससे कर्ज़, मानसिक तनाव और आजीविका संकट बढ़ेगा।
अब समय है कि कश्मीर की बागवानी नीति में फसल बीमा को मुख्यधारा में लाया जाए। अब टुकड़ों में दी जाने वाली राहत से काम नहीं चलेगा। डेटा-आधारित क्षेत्र-विशेष बीमा मॉडल, जिसे किसानों, बीमाकर्ताओं और एग्री-टेक विशेषज्ञों के साथ मिलकर बनाया जाए। वही इस संकट का स्थायी समाधान है।
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