साप्ताहिक मौसम विश्लेषण-अगस्त में 14% बारिश की कमी, भारी बारिश के बावजूद क्यों नहीं घट रहा सूखे का खतरा?
मुख्य मौसम बिंदु
- अगस्त के अंत में भारत का मौसमी बारिश घाटा करीब 14% रहा।
- बंगाल की खाड़ी के सिस्टम से पूर्वी भारत में भारी बारिश।
- एक ही समय में कुछ क्षेत्रों में बाढ़ और जलभराव, दक्षिणी प्रायद्वीप में बारिश की कमी।
- ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ में कोयला खनन व परिवहन प्रभावित।
- पूर्वानुमान वैधता: यह मौसम विश्लेषण 10 सितंबर 2026 तक मान्य है।
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अगस्त 2026 का महीना देश में करीब 14% मानसूनी बारिश की कमी के साथ खत्म हुआ। इस दौरान बारिश का वितरण लगातार असमान बना रहा। बंगाल की खाड़ी (BoB) से बार-बार बनने वाले मौसम सिस्टम पूर्वी भारत के एक सीमित हिस्से में तेज और भारी बारिश करा रहे हैं, जबकि देश के कई बड़े हिस्से अभी भी बारिश की कमी से जूझ रहे हैं। अब चिंता सिर्फ बारिश और कृषि तक सीमित नहीं है। पूर्वी भारत के कोयला उत्पादक और परिवहन वाले इलाकों में भारी बारिश ने कोयले की आवाजाही प्रभावित की है। यह स्थिति ऐसे समय बनी है जब 45 थर्मल पावर प्लांट में कोयले का भंडार बेहद कम स्तर पर पहुंच गया है। इससे मौसम, कोयला सप्लाई और बिजली बाजार के बीच सीधा संबंध बन गया है, खासकर सितंबर की शुरुआत में।
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सबसे बड़ा सवाल: बारिश कहां हो रही है?
अब सवाल केवल यह नहीं है कि देश में भारी बारिश हो रही है या नहीं। असली सवाल यह है कि बारिश कहां हो रही है, क्या इससे सूखे जैसी स्थिति कम हो रही है और एक ही क्षेत्र में बार-बार हो रही भारी बारिश का महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा आपूर्ति पर क्या असर पड़ रहा है।
भारी बारिश के बावजूद मानसूनी कमी बरकरार
भारत अगस्त के अंत में करीब 14% मौसमी बारिश की कमी के साथ पहुंचा है। जुलाई के अंत में यह कमी करीब 13% थी। पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में लगातार तेज बारिश हुई, लेकिन आंध्र प्रदेश, बिहार, पंजाब और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में बारिश की कमी बनी हुई है। एक और सुस्पष्ट निम्न दबाव क्षेत्र पूर्वी और इससे जुड़े मध्य भारत में भारी बारिश करा रहा है, जबकि दक्षिणी प्रायद्वीप के बड़े हिस्से में मौसम अपेक्षाकृत शांत है। बारिश का यही असमान वितरण सबसे बड़ी चिंता है। कुछ इलाकों में जरूरत से ज्यादा बारिश हो रही है, जबकि जिन क्षेत्रों को बारिश की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहां अभी भी सुधार नहीं हुआ है।
आखिर भारी बारिश सूखे की स्थिति क्यों नहीं खत्म कर रही?
भारी बारिश और सूखे जैसी स्थिति एक साथ रह सकती हैं, क्योंकि मानसून का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होता कि कुल कितनी बारिश हुई। यह भी महत्वपूर्ण है कि बारिश कहां हुई और कितनी नियमितता से हुई। बंगाल की खाड़ी से लगातार बन रहे सिस्टम ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार और आसपास के मध्य भारत में तेज बारिश ला रहे हैं। इससे कुछ क्षेत्रों में बाढ़ और जलभराव की स्थिति बन रही है।
वहीं, दक्षिणी प्रायद्वीप, उत्तर-पश्चिमी भारत और अन्य बारिश की कमी वाले क्षेत्रों में ऐसी राहत वाली बारिश नहीं हो रही है। पहले से ज्यादा बारिश वाले इलाकों में कुछ दिनों की मूसलाधार बारिश, दूसरे क्षेत्रों में कई सप्ताह से चली आ रही बारिश की कमी की भरपाई नहीं कर सकती।यही मानसून 2026 का विरोधाभास है-कुछ क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति है, जबकि पूरे देश का औसत बारिश के मामले में अभी भी कमी दिखा रहा है।
पूर्वी भारत का बारिश वाला कॉरिडोर बना मुख्य केंद्र
बंगाल की खाड़ी (BoB) में बनने वाले मौसम सिस्टम लगातार सबसे सक्रिय मानसूनी गतिविधियों को पूर्वी भारत के इसी कॉरिडोर की ओर ले जा रहे हैं। ओडिशा, गंगीय पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ मुख्य केंद्र बने हुए हैं। बारिश का प्रभाव आगे पूर्वी मध्य प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक पहुंच रहा है। इन क्षेत्रों में बार-बार हो रही भारी बारिश से जलभराव, बाढ़ और सड़क, रेल, खनन तथा औद्योगिक गतिविधियों में व्यवधान का खतरा बढ़ रहा है।दूसरी ओर, आंतरिक प्रायद्वीपीय भारत के बड़े हिस्से में मानसून कमजोर बना हुआ है। इससे देश में बारिश का असमान पैटर्न और स्पष्ट हो रहा है। कुछ क्षेत्रों में जरूरत से ज्यादा बारिश, जबकि बारिश की जरूरत वाले इलाकों में कमी।
El Niño अभी भी पूर्वी हिस्से में ज्यादा मजबूत
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El Niño का प्रभाव अभी भी पूर्वी हिस्से में ज्यादा मजबूत बना हुआ है। Niño-3.4 का तापमान +1.8°C, Niño-1+2 +3.2°C, Niño-4 करीब 0.0°C और मई-जुलाई का RONI +1.0°C है।शरद और सर्दियों के दौरान बहुत मजबूत El Niño बनने की संभावना 90% से अधिक बताई गई है। इससे मानसून के अंतिम चरण में बारिश को लेकर चिंता बनी हुई है। हालांकि, बंगाल की खाड़ी में बनने वाले मौसम सिस्टम अभी भी किसी क्षेत्र में बहुत तेज बारिश करा सकते हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर बारिश की कमी के बावजूद कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश जारी रह सकती है।
बारिश से कोयला सप्लाई और बिजली व्यवस्था पर असर
अगस्त के अंतिम दिनों में मौसम और ऊर्जा क्षेत्र के बीच संबंध और महत्वपूर्ण हो गया है। 25 अगस्त तक 45 कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में कोयले का भंडार आवश्यकता के 25% से कम था या तीन दिन की बिजली उत्पादन जरूरत पूरी करने लायक भी स्टॉक नहीं था। जुलाई के अंत में ऐसे संयंत्रों की संख्या 31 थी। इनमें से 40 प्लांट घरेलू कोयले पर निर्भर हैं। बिजली संयंत्रों में कुल कोयला स्टॉक जुलाई के अंत की तुलना में करीब 19% घटकर 30.95 मिलियन टन रह गया। यह मात्रा लगभग 10 दिनों की परिचालन जरूरत के बराबर है।
ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ में बारिश से कोयला परिवहन प्रभावित
ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ में भारी बारिश ने कोयला खनन और परिवहन को प्रभावित किया है। खास बात यह है कि यही क्षेत्र एक बार फिर तेज मानसूनी बारिश के केंद्र में हैं। कुछ बिजली संयंत्रों को उनकी जरूरत के मुकाबले केवल करीब आधी कोयला रेक मिल रही हैं। वहीं, कुछ प्लांटों में रखरखाव का काम भी आगे बढ़ाया गया है। यह स्थिति पिछले सप्ताह की तुलना में महत्वपूर्ण बदलाव दिखाती है। अब कोयला सप्लाई में मौसम से जुड़ी बाधा केवल संभावित जोखिम नहीं रही, बल्कि बिजली संयंत्रों के वास्तविक स्टॉक में इसका असर दिखाई देने लगा है। हालिया सरकारी आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट में भी 45 प्लांटों के गंभीर रूप से कम कोयला स्टॉक और भारी बारिश से सप्लाई बाधित होने की पुष्टि हुई है।
बारिश से कोयला और फिर शाम की बिजली कीमतों तक असर
भारी बारिश से कोयला खनन, रेलवे पर लोडिंग और रेक की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। इससे थर्मल पावर प्लांटों तक कोयले की सप्लाई कम हो जाती है। यह स्थिति खासकर सूर्यास्त के बाद महत्वपूर्ण हो जाती है। शाम के समय सौर बिजली उत्पादन तेजी से कम होता है, जबकि बिजली की मांग बनी रह सकती है। ऐसे में थर्मल और अन्य भरोसेमंद बिजली स्रोतों पर निर्भरता बढ़ जाती है। 31 अगस्त को IEX Day-Ahead Market में औसत बिजली कीमत ₹5.387/kWh रही, जो एक सप्ताह पहले ₹7.300/kWh थी। वहीं, क्लियर किया गया वॉल्यूम बढ़कर करीब 183,730 MWh हो गया। हालांकि बाजार की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन कम कोयला सप्लाई, मौसम से जुड़ी बाधाएं और शाम के समय बिजली की मांग अभी भी संचालन के लिए चिंता का विषय हैं। इसका मतलब देशभर में बिजली की कमी नहीं है।
कृषि में कुल बारिश से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसका वितरण
अब जब खरीफ की बुवाई लगभग पूरी हो चुकी है, फसलों के लिए जोखिम केवल बोए गए क्षेत्र पर निर्भर नहीं करता। अब मिट्टी में नमी, बारिश के बीच सूखे अंतराल की अवधि, सिंचाई की उपलब्धता और बारिश का वितरण ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। पूर्वी भारत में भारी बारिश स्थानीय स्तर पर पानी की उपलब्धता बेहतर कर सकती है, लेकिन इससे दूर स्थित बारिश की कमी वाले क्षेत्रों में मिट्टी की नमी की समस्या खत्म नहीं होगी। बारिश पर निर्भर फसलें इस बात के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं कि पूरे सीजन में बारिश किस तरह वितरित हुई। कुछ दिनों की बेहद भारी बारिश, पूरे सीजन में नियमित और समान रूप से हुई बारिश जैसा लाभ नहीं दे सकती। इसीलिए किसी क्षेत्र में भारी बारिश होने का मतलब यह नहीं है कि भारत का व्यापक सूखा जोखिम खत्म हो गया है।
मानसून और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी असर
लगातार हो रही मानसूनी बारिश से स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी बढ़ रही हैं। एक हालिया आकलन के अनुसार 209 में से 186 शहरों में मानसून से जुड़ी बुखार की स्थिति का जोखिम बढ़ा है।लगातार बारिश, ज्यादा नमी, जमा हुआ पानी और दूषित पानी मौसमी बीमारियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बना सकते हैं। सितंबर के पहले सप्ताह में भी असमान रहेगा मानसून
सितंबर के पहले सप्ताह में भी अगस्त जैसा ही बेहद असमान मानसून पैटर्न बने रहने की संभावना है। पूर्वी और इससे जुड़े मध्य भारत में अच्छी बारिश मुख्य केंद्र बनी रहेगी। ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, गंगीय पश्चिम बंगाल, पूर्वी मध्य प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बारिश पर करीबी नजर रखने की जरूरत होगी। इसके विपरीत, आंतरिक प्रायद्वीपीय भारत में तत्काल व्यापक स्तर पर मानसून की वापसी की संभावना कम है। उत्तर बंगाल की खाड़ी में एक और सर्कुलेशन बनने के बाद पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में बारिश फिर बढ़ सकती है। हालांकि, इसके आगे जमीन के अंदर जाने का रास्ता अभी स्पष्ट नहीं है।
सितंबर के शुरुआती 10 दिनों में मामूली सुधार संभव
देश में मौजूदा करीब 14% बारिश की कमी सितंबर के पहले 10 दिनों में लगभग 1-2 प्रतिशत तक कम हो सकती है। इसके बाद यह कमी फिर धीरे-धीरे बढ़ने की संभावना है। इसका अर्थ है कि शुरुआती सितंबर में कुछ क्षेत्रों में अच्छी बारिश होने के बावजूद पूरे देश के स्तर पर मानसून की कमी खत्म होने की संभावना कम है। अब इस मानसून की तस्वीर में एक तीसरा महत्वपूर्ण पहलू जुड़ गया है। जिस बारिश से देश की व्यापक सूखे जैसी स्थिति खत्म नहीं हो रही, वही बारिश भारत की कोयला और लॉजिस्टिक्स सप्लाई चेन को प्रभावित कर रही है, जो थर्मल पावर सिस्टम के लिए महत्वपूर्ण है।
इस मानसून से सबसे बड़ा संदेश यही निकलता है कि कुल बारिश से ज्यादा महत्वपूर्ण बारिश का वितरण है। कृषि और पानी की उपलब्धता से लेकर कोयले की आवाजाही और बिजली बाजार तक, प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि भारी बारिश किन क्षेत्रों में केंद्रित है और कौन से इलाके अब भी सूखे बने हुए हैं। मानसून 2026 यह दिखा रहा है कि एक ही मौसम एक साथ कहीं कमी और कहीं व्यवधान दोनों पैदा कर सकता है।















