13% बारिश की कमी के साथ मानसून 2026 समाप्त, देश में सूखे की स्थिति
मुख्य मौसम बिंदु
- मानसून 2026 में LPA से 13% कम बारिश हुई और इसे हल्के सूखे की स्थिति माना गया।
- जून में बारिश की कमी 35% तक पहुंच गई, जबकि अगस्त के लंबे मानसून ब्रेक ने स्थिति और बिगाड़ी।
- El Niño अगस्त में मजबूत और सितंबर में बहुत मजबूत हुआ, Nino 3.4 इंडेक्स करीब +3°C तक पहुंचा।
- देश के करीब आधे हिस्से में मानसूनी बारिश सामान्य से कम रही, जबकि ओडिशा में LPA से 30% अधिक बारिश दर्ज हुई।
- पूर्वानुमान वैधता: यह विश्लेषण 30 सितंबर 2026 तक के मानसून सीजन के प्रदर्शन और उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित है।
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दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 का सफर अब खत्म हो गया है। इस साल देश में सामान्य से 13% कम बारिश हुई। इस कमी को ‘माइल्ड ड्राउट’ यानी हल्के सूखे की स्थिति माना जाएगा। गौरतलब है, लंबे समय के औसत (LPA) से 10% से अधिक बारिश की कमी होने पर उसे सूखे की श्रेणी में रखा जाता है। इससे पहले भारत में आखिरी बार 2015 में सूखे की स्थिति बनी थी। इसके बाद 2016 से 2025 के बीच नौ में से सात साल मानसून सामान्य या सामान्य से अधिक रहा।
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El Niño की आशंका के बीच शुरू हुआ था मानसून 2026
आमतौर पर एक मानसून सीजन खत्म होने के कुछ ही महीनों बाद अगले मानसून को लेकर चर्चा शुरू हो जाती है। लेकिन 2026 के मानसून को लेकर चिंता इससे भी पहले शुरू हो गई थी। क्योंकि प्रशांत महासागर में अल नीनो (El Niño) की परिस्थितियां बनने के शुरुआती संकेत मिलने लगे थे। दिसंबर 2025 में ही स्काईमेट के एमडी जतिन सिंह ने इस पर चिंता जताई थी। उनका कहना था कि पूरी तरह विकसित El Niño से ज्यादा चिंता उस El Niño की है जो धीरे-धीरे विकसित हो रहा हो, क्योंकि इससे सामान्य से कम बारिश होने की करीब 60% संभावना बन सकती है। यही वजह थी कि मानसून 2026 शुरू होने से पहले ही इसके कमजोर रहने की आशंका जताई जाने लगी थी। क्योंकि मजबूत अल-नीनो विकसित होने की स्थिति साल2026 की सर्दियों में ही बनने लगी थी
जून में मानसून की शुरुआत असमान रही, बारिश की कमी 35% पहुंची
मानसून की शुरुआत देश के अलग-अलग हिस्सों में एक जैसी नहीं रही। इसकी सबसे बड़ी वजह मजबूत El Niño की आशंका थी, जो 2026 की शुरुआती सर्दियों से ही विकसित होना शुरू हो गया था। जून में मौसम प्रणालियों की कमी और मानसून के असमान रहने से बारिश का वितरण बिगड़ गया। जिससे मानसून देश के सभी हिस्सों में एक समान तरीके से नहीं पहुंचा। जिससे बारिश कुछ इलाकों में ज्यादा, तो कुछ जगहों पर बहुत कम हुई। इसके कारण जून के अंत तक देश में बारिश की कमी LPA की 35% तक पहुंच गई।
हालांकि, जुलाई में बारिश की स्थिति में सुधार हुआ। इस महीने में देश के मुख्य मानसूनी वर्षा वाले क्षेत्रों में बारिश काफी हद तक संतुलित रही। जहां मानसून की बारिश खेती और पानी के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है, बारिश काफी हद तक सामान्य और समान रूप से हुई। इससे मानसून को कुछ राहत मिली। लेकिन यह सुधार ज्यादा समय तक नहीं टिक सका।
अगस्त के लंबे मानसून ब्रेक ने फिर बिगाड़ा बारिश का संतुलन
अगस्त में मानसून लंबे समय तक कमजोर पड़ गया। इसे ‘ब्रेक इन मानसून’ कहा जाता है। इसका मतलब है कि मानसून की बारिश वाली गतिविधियां कुछ समय के लिए काफी कम हो जाती हैं। अगस्त में यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही। इससे देश के अलग-अलग हिस्सों में बारिश के समय और मात्रा का संतुलन बिगड़ गया था।
यानी जहां बारिश की जरूरत थी, वहां पर्याप्त बारिश नहीं हुई और कुछ दूसरे इलाकों में अलग समय पर बारिश हुई। इसी वजह से मानसून सीजन के आधे पड़ाव तक स्थिति सूखे की ओर बढ़ती दिखाई देने लगी थी। यह वही स्थिति थी, जिसकी आशंका Skymet ने मानसून के आधे सीजन के विश्लेषण में जताई थी।
सितंबर में भारी बारिश ने घटाया बारिश का घाटा, फिर भी मानसून कमजोर
सितंबर के आखिरी सप्ताह तक मानसून की मौसमी बारिश में 14 से 15% की कमी बनी हुई थी। लेकिन सितंबर के अंत में एक असामान्य उष्णकटिबंधीय मौसम प्रणाली बनी, जो मानसून के दौरान सामान्य तौर पर बहुत कम देखने को मिलती है। इस सिस्टम के कारण गंगा के मैदानी इलाकों से जुड़े कुछ राज्यों में बेहद भारी बारिश हुई और कई जगहों पर बाढ़ जैसी स्थिति बनी।
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इस अत्यधिक बारिश का असर पूरे देश के बारिश के आंकड़े पर पड़ा। जिससे सितंबर के अंतिम दिनों में मौसमी कमी घटकर करीब 12% रह गई। हालांकि, इसके बावजूद पूरे मानसून सीजन का अंतिम आंकड़ा 13% की कमी के साथ समाप्त हुआ। इस तरह भारत में करीब नौ साल बाद फिर सूखे की स्थिति बनी। इससे पहले 2014 और 2015 में लगातार दो साल सूखा पड़ा था।
El Niño हुआ मजबूत, लेकिन असर उम्मीद से अलग रहा
भारतीय मानसून पर समुद्र की परिस्थितियों का बड़ा प्रभाव होता है। इसमें एक तरफ दूर प्रशांत महासागर और दूसरी तरफ भारत के पास मौजूद हिंद महासागर की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। गौरतलब है, हिंद महासागर की स्थिति को समझने के लिए Indian Ocean Dipole यानी IOD को देखा जाता है। इसीलिए मानसून 2026 के दौरान Indian Ocean Dipole (IOD) भी चर्चा में रहा है। पहले अनुमान था कि मानसून के दौरान IOD पॉजिटिव हो सकता है, लेकिन पूरे मानसून सीजन के दौरान यह लगातार न्यूट्रल स्थिति में रहा। सितंबर के दूसरे हिस्से में यह पॉजिटिव सीमा के ऊपर जरूर गया, लेकिन तब तक मानसून पर प्रभाव डालने के लिए काफी देर हो चुकी थी। इसलिए इसका कोई बड़ा सकारात्मक प्रभाव देखने को नहीं मिला।
दूसरी ओर, अल नीनो (El Niño) अगस्त में ‘मजबूत’ और सितंबर में और मजबूत होकर ‘बहुत मजबूत’ श्रेणी में पहुंच गया। El Niño की ताकत मापने के लिए प्रशांत महासागर के Nino 3.4 क्षेत्र के समुद्री सतह तापमान को देखा जाता है। Nino 3.4 क्षेत्र में 16 सितंबर 2026 के आसपास समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से +3°C ऊपर पहुंच गया था। 1950 से उपलब्ध रिकॉर्ड में यह इस सूचकांक का सबसे ऊंचा स्तर था। समुद्र की सतह के नीचे भी तापमान सामान्य से 8°C से ज्यादा ऊपर चला गया था।
हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि El Niño जितना मजबूत होगा, मानसून पर असर भी उसी अनुपात में ज्यादा होगा। एक कमजोर El Niño भी मानसून को नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन समुद्र के तापमान में इतनी तेज और असामान्य बढ़ोतरी इस बात का संकेत देती है कि यह El Niño जल्दी या अचानक खत्म नहीं होगा और यह सामान्य 9 से 12 महीने की अवधि से ज्यादा लंबे समय तक बना रह सकता है।
करीब आधे देश में बारिश की कमी, कई राज्यों में राहत
मानसून 2026 की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि देश के करीब 50% हिस्से में बारिश की कमी रही, जबकि बाकी क्षेत्रों में बारिश सामान्य से अधिक या सामान्य के आसपास रही। बारिश की कमी केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि देश के चारों प्रमुख मौसम क्षेत्रों में इसके अलग-अलग हिस्से प्रभावित हुए।
उत्तर भारत: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी राजस्थान में कमी रही।
पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत: बिहार, असम-मेघालय और अरुणाचल प्रदेश प्रभावित रहे।
मध्य भारत: विदर्भ, मराठवाड़ा और सौराष्ट्र-कच्छ में बारिश कम रही।
दक्षिण प्रायद्वीप: आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में भी कमी देखी गई।
वहीं, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और उत्तर प्रदेश में बारिश अच्छी रही। इन राज्यों में अक्सर बारिश की कमी देखने को मिलती है, लेकिन 2026 में ये राज्य बारिश की कमी स्थिति से बाहर निकलने में सफल रहे हैं। इनमें ओडिशा सबसे आगे रहा और जहां LPA से 30% अधिक बारिश दर्ज हुई। कुल मिलाकर, मानसून 2026 पर जिस बेहद मजबूत ‘सुपर El Niño’ के गंभीर प्रभाव की शुरुआत में आशंका जताई गई थी, उसका अत्यधिक गंभीर असर इस मानसून सीजन में देखने को नहीं मिला।
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