पश्चिमी हिमालय में सूखे जैसे हालात, पहाड़ों पर बर्फबारी नदारद होने से बढ़ी चिंता, जानें पूरा मौसम का हाल
मुख्य मौसम बिंदु
- पश्चिमी हिमालय में अक्टूबर के बाद से बारिश और बर्फबारी लगभग नदारद
- बढ़ते तापमान के कारण बर्फ टिक नहीं पा रही
- ग्लेशियरों और नदियों में जल प्रवाह कम
- खेती, पर्यटन और जल सुरक्षा पर गंभीर असर
पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र इस समय गंभीर सूखे जैसे हालात का सामना कर रहा है। लंबे समय से बारिश और बर्फबारी नहीं होने के कारण हालात चिंताजनक बनते जा रहे हैं। पूरे मौसम में अब तक बारिश और बर्फबारी का केवल एक ही बार 6 अक्टूबर को देखने को मिली थी। इसके बाद से पहाड़ी इलाकों में मौसम लगभग पूरी तरह शुष्क बना हुआ है। आमतौर पर सर्दियों में बर्फ से ढके रहने वाले पहाड़ इस बार सूखे, भूरे और खाली दिखाई दे रहे हैं।
बढ़ता तापमान बना बर्फ के टिक न पाने की बड़ी वजह
इस असामान्य स्थिति के पीछे एक प्रमुख कारण तापमान में लगातार बढ़ोतरी है। तापमान अधिक रहने के कारण जो थोड़ी-बहुत बर्फ गिर भी रही है, वह लंबे समय तक टिक नहीं पा रही। लगातार बर्फबारी न होने से मौसमी हिमावरण (Snow Cover) जमा नहीं हो पा रहा, जिससे सतह तेजी से पिघल रही है और पहाड़ और भी ज्यादा संवेदनशील होते जा रहे हैं।
सामान्य मौसम चक्र से बिल्कुल अलग रहा यह सीज़न
मौसम विज्ञान के अनुसार, पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) आमतौर पर अक्टूबर के मध्य से पश्चिमी हिमालय को प्रभावित करना शुरू कर देते हैं। नवंबर में ही बारिश और बर्फबारी देखने को मिलती है। दिसंबर में एक या दो शक्तिशाली पश्चिमी विक्षोभ आमतौर पर मध्यम से भारी बर्फबारी कराते हैं। औसतन दिसंबर और जनवरी में 3 से 4 सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ आते हैं, जिससे भारी हिमपात होता है।
नवंबर और दिसंबर लगभग रहे सूखे
लेकिन इस साल मौसम ने बिल्कुल अलग रुख अपनाया है। नवंबर और दिसंबर का पहला पखवाड़ा लगभग बिना किसी खास मौसम गतिविधि के बीत चुका है। ऐसा ही शुष्क पैटर्न साल 2024 में भी देखा गया था, जिससे चिंता और बढ़ गई है।
दिसंबर के अंत तक भी बड़ी राहत की उम्मीद नहीं
मौजूदा मौसम पूर्वानुमान के अनुसार, दिसंबर के अंत तक पश्चिमी हिमालय में किसी बड़े पश्चिमी विक्षोभ के आने की संभावना नहीं है। हालांकि 20 और 21 दिसंबर के आसपास एक सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ आने की संभावना है, लेकिन इसका असर मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख तक सीमित रहने की उम्मीद है। हिमाचल प्रदेश में भी केवल कुछ चुनिंदा इलाकों में हल्की बारिश या बर्फबारी हो सकती है, जबकि उत्तराखंड के पूरी तरह सूखा रहने की संभावना है।
नदियों में घट रहा जल प्रवाह
इस लंबे सूखे का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। पश्चिमी हिमालय के ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियों में पानी का बहाव कम हो गया है। बारिश और बर्फबारी की कमी से जल स्रोतों पर सीधा असर पड़ रहा है।
पर्यटन उद्योग को नुकसान, खेती-बागवानी पर गंभीर प्रभाव
इस मौसमीय संकट का सबसे ज्यादा असर कृषि और बागवानी पर पड़ रहा है। खासतौर पर सेब की खेती प्रभावित हो रही है, क्योंकि सेब के पेड़ों को सर्दियों में पर्याप्त ठंड (Winter Chilling) और बर्फ की परत की जरूरत होती है। बर्फबारी न होने से आने वाले सीज़न की पैदावार पर भी खतरा मंडरा रहा है। पर्यटन भी इस हालात से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। लोकप्रिय हिल स्टेशन और स्कीइंग रिसॉर्ट्स में बर्फ न होने के कारण पर्यटक नहीं पहुंच रहे हैं। सर्दियों का पर्यटन, जो स्थानीय लोगों की आजीविका का बड़ा जरिया है, इस साल भारी नुकसान झेल रहा है।
ग्लेशियर पिघल रहे, भविष्य के लिए खतरे की घंटी
सबसे चिंताजनक बात यह है कि ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं और नई बर्फबारी न होने से उनका पुनर्भरण (Replenishment) नहीं हो पा रहा। यह स्थिति न केवल हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरनाक है, बल्कि उन करोड़ों लोगों के लिए भी खतरा बन सकती है, जो पीने के पानी और सिंचाई के लिए इन ग्लेशियरों पर निर्भर हैं।
पहाड़ से मैदान तक, सभी के लिए गंभीर चेतावनी
बारिश और बर्फबारी की लगातार कमी केवल पहाड़ी इलाकों की समस्या नहीं है। इसका असर मैदानी क्षेत्रों तक पड़ेगा, जो हिमालयी नदियों पर निर्भर हैं। कृषि, पेयजल और पर्यावरणीय संतुलन तीनों के लिए यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है।








