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[HINDI] कड़ाके की ठंड में पाले से फसलों को बचाने के लिए किसान अपनाएं ये देशी उपाय

December 21, 2023 5:35 PM |

भारत में अभी सर्दी का मौसम है. तापमान गिरने के साथ मौसम में धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है. जिस कारण ओस, कोहरा, ठंड, पाले और धुंध का भी असर दिखाई देने लगा है. बदलते मौसम का असर सबसे ज्यादा फसलों पर होता है. जिससे किसानों को नुकसान होता है. दिसंबर और जनवरी के महिने में शीतलहर और पाला पड़ने की संभावना सबसे ज्यादा रहती है. पाला लगभग सभी तरह की फसलों के लिए हानिकारक होता है. क्योंकि पाले के प्रभाव से फसल सड़ गलकर बर्बाद हो जाती है. ऐसे में किसान कुछ सावधानियां बरत कर फसल को खराब होने से बचा सकते है. जिससे उन्हे नुकसान नहीं होगा.

पाले का फसलों पर असर: पाला जब गेहूं और जौ की फसल पर पड़ता है, तो 10 से 20 फीसदी फसल खराब हो जाती है. सरसो, जीरा, धनिया, सौंफ, चना, मटर, अफीम, गन्ने आदि की फसल में लगभग 30 से 40 फीसदी तक नुकसान होता है. वहीं, सब्जियों में आलू, मिर्ची, टमाटर, बैंगन आदि फसल को पाले और शीतलहर से 40 से 60 फीसदी हानि होती है. वहीं, पाले और शीतलहर का सबसे ज्यादा असर सरसों, आलू और नवरोपित फसलों को होता है. पाला गिरने के बाद आलू और सरसों की फसल में झुलसा रोग लग जाता है. जिससे फसल सड़ और सूख कर बर्बाद हो जाती है.

पाला से उपज और गुणवत्ता प्रभावित: कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार पाला गिरने के बाद पौधों की पत्तियां झुलस, टहनियां और तने नष्ट हो जाते है. जिससे पौधे में कई बीमारियां लग जाती है. साथ ही फसलों के फूल सिकुड़ कर झड़ने लगते हैं. फूल के गिरने से फसल की पैदावार में कमी हो जाती है, कई बार फल कमजोर होकर मर भी जाते है. पाले से पत्तियों और फूलों के मुरझाने के बाद फसल बदरंग हो जाती है. 

क्योंकि पौधे के पत्तों और तने तक धूप, हवा नहीं पहुंच पाती है. जिससे पत्ते सड़ने लगते है और पौधे में बीमारियां बढ़ने लगती है. वहीं, पाला पड़ने के बाद फल के ऊपर भी धब्बे पड़ जाते है, इससे फल की गुणवत्ता के साथ स्वाद भी खराब हो जाता है. फसल के पौधे कमजोर और पीले पड़ लगते हैं. जिससे फसल के उत्पादन पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है. इससे कभी-कभी पूरी फसल फसल नष्ट हो जाती है.

पाले से बचाव के लिए करे देशी उपाय: किसान हर मौसम में अपनी फसलों को बचान के लिए कई तरह के इंतजाम करते हैं. इनमें कुछ देशी जुगाड़ है, जिनके प्रयोग से पाले की मार फसल पर रोकी जा सकती है. जिस रात पाला पड़ने की संभावना हो, किसान उस रात में 12 बजे के बाद खेत की मेड़ों पर थोड़ी- थोड़ी दूरी पर कूड़ा-कचरा और सूखी पत्तियां, घासफूस जलाकर धुआं कर दे. जिससे धुआं खेत में चला जाएगा. ऐसा करने से फसल के आसपास का वातावरण गर्म हो जाता है. साथ ही किसान धुआं करने के लिए फ्रूड ऑयल का भी प्रयोग कर सकते है. इस तरह धुआं करने से खेत का तापमान 4 डिग्री तक बढ़ाया जा सकता है.

इसके अलावा पाले से बचाने के लिए किसान फसलों की सिचांई करे. ऐसा करने फसलों पर पाले का असर कम होता है. क्योंकि नमीयुक्त में जमीन में काफी देर तक गर्मी रहती है और जमीन का तापमान तेजी से कम नहीं होता है. नमी होने पर शीतलहर और पाले से फसल को नुकसान की संभावना कम रहती है. वैज्ञानिकों के अनुसार सिंचाई करने से खेत में 2 डिग्री सिल्सियस तक तापमान बढ़ जाता है. 

वहीं, किसान पाला पड़ने के समय रस्सी के दोनों छोर को पकड़ ले. इसके बाद खेत में एक मेड़ से दूसरी मेड़ की तरफ या एक से दूसरी छोर की तरफ रस्सी से फसल को हिलाते हुए ले जाए. ऐसा करने से पौधों के ऊपर गिरी ओस की बूंदे नीचे गिर जाएंगी और फसल पाले से बच जाएगी. अगर किसान नर्सरी या सीमित क्षेत्र वाली फसल तैयार कर रहे हैं. तो जमीन का तापमान कम नहीं होने देने के लिए फसल को पॉलीथिन, टाट और भूसे से ढक दें. इसके बाद क्यारियों में वायुरोधी घास-फूस की टाटियां बना कर लगा दे. लेकिन ये काम केवल रात में ही करें, सुबह होने पर इन्हे हटा दे. जिससे फसल को धूप मिल सके.

पाले से बचाव का दीर्घकालिन उपाय: फसलों को पाले से लंबे समय तक बचान के लिए वायु रोधक पेड़ों को लगाना चाहिए. इसके लिए किसान अपने खेत की उत्तर और पश्चिम मेंड़ पर और खेत में बीच-बीच में उचित जगहों पर शहतूत, शीशम, खेजड़ी, आम, अरडू, बबूल, और जामुन के पेड़ लगाए. ये सभी पेड़ ठंडी हवा और पाले से फसल को रोकने में सक्षम होते है.

इन दवाईयों का करे छिड़काव: फसलों को पाले के प्रभाव से बचाने के लिए देशी जुगाड़ के अलावा दवाईयों का भी छिड़काव कर सकते है. पाला पड़ने के समय के दौरान किसान फसलों पर गंधक का तेजाब, यूरिया और घुलनशील सल्फर को पानी में मिलाकर छिड़काव करें. फसल पर छिड़काव के लिए  इन सभी रसायनिकों दवाईयों की मात्रा पैकेट पर बताई गई माप के अनुसार ही ले.  जैसे फसलों पर गंधक के तेजाब के 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए.  

एक हेक्टर क्षेत्र में छिड़काव के लिए प्लास्टिक के स्प्रेयर से एक लीटर गंधक के तेजाब को 1000 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें. इस छिड़काव का असर फसल पर दो सप्ताह तक रहता है. अगर दो सप्ताह के बाद भी पारा गिरने और शीत लहर की संभावना है, तो गंधक के तेजाब को 15-15 दिन के अंतराल से दोहराते रहे.दवाईयों के छिड़काव से पौधों की कोशिकाओं में मौजूद जीवद्रव्य का तापमान बढ़ जाता है. जिससे फसल का पाले से बचाव होता है. बता दें, सरसों, चना, आलू, गेहूं और मटर की फसलों पर गंधक के तेजाब का छिड़काव करने से पाले के बचाव के साथ फसल में लौह तत्व की जैविक और रसायनिक सक्रियता बढ़ जाती है. जो पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ान के साथ फसल को जल्दी पकाने में मददगार होती है.

फोटो क्रेडिट- गाँव कनेक्शन






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