Air Turbulence: आसमान में छिपा खतरा, उड़ान के दौरान अचानक क्यों हिलने लगता है विमान? जानें वजह

By: AVM GP Sharma | Edited By: Mohini Sharma
Aug 6, 2026, 7:00 PM
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मुख्य मौसम बिंदु

  • AI2379 फुकेत-दिल्ली उड़ान में बंगाल की खाड़ी के ऊपर करीब पांच मिनट गंभीर टर्बुलेंस रहा।
  • विमान में 137 यात्री और 8 क्रू सदस्य थे,13 यात्रियों और 4 क्रू समेत 17 लोग घायल हुए।
  • विमान ने क्रूज के दौरान करीब 300 फीट ऊंचाई खोई।
  • घटना में Convective Turbulence की संभावना सबसे अधिक मानी जा रही है।
  • Forecast/Analysis Validity: विश्लेषण 4 अगस्त 2026 की घटना पर आधारित है; अंतिम कारण DGCA की जांच के बाद स्पष्ट होंगे।

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फुकेत से दिल्ली आ रही एयरबस A320neo (Airbus A320neo) की फ्लाइट AI2379 को 4 अगस्त 2026 को बंगाल की खाड़ी के ऊपर तेज टर्बुलेंस (Severe Turbulence) का सामना करना पड़ा। उस समय विमान भारतीय हवाई सीमा में दाखिल होने से कुछ पहले अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र (International Waters) के ऊपर उड़ रहा था। विमान में 137 यात्री और 8 क्रू सदस्य सवार थे। करीब पांच मिनट तक विमान खराब मौसम और तेज हवा के झटकों से प्रभावित रहा। इस दौरान विमान अचानक नीचे की ओर गया और करीब 300 फीट ऊंचाई कम हो गई। यह घटना ओडिशा के ऊपर पहुंचने से कुछ समय पहले हुई। टर्बुलेंस के कारण 13 यात्रियों और 4 क्रू सदस्यों समेत कुल 17 लोग घायल हुए। घटना की जांच डीजीसीए (DGCA) कर रहा है। जांच में कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (Cockpit Voice Recorder) और फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (Flight Data Recorder) की जानकारी देखी जा रही है।

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टर्बुलेंस आने का मतलब हमेशा विमान दुर्घटना नहीं

यह समझना जरूरी है कि विमान में तेज टर्बुलेंस(Severe Turbulence) आने को सीधे तौर पर विमान दुर्घटना (Accident) नहीं कहा जाता। अगर उड़ान के दौरान कोई ऐसी घटना होती है जिससे यात्रियों या विमान की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है, लेकिन वह दुर्घटना की श्रेणी में नहीं आती, तो उसे विमानन घटना (Incident) कहा जाता है। टर्बुलेंस को आसान भाषा में समझें तो यह हवा में अचानक होने वाली तेज हलचल है। जैसे सड़क पर गाड़ी चलते समय अचानक गड्ढा आने पर झटका लगता है, वैसे ही हवा की अलग-अलग गति और दिशा के कारण विमान को झटके महसूस हो सकते हैं। टर्बुलेंस मुख्य रूप से तीन तरह का होता है, जिसमें पहल है तूफानी बादलों से बनने वाला संवहनीय टर्बुलेंस (Convective Turbulence), दूसरा साफ आसमान में होने वाला टर्बुलेंस (Clear-Air Turbulence) और तीसरा है पहाड़ों के आसपास बनने वाला पर्वतीय टर्बुलेंस (Mountain-Wave Turbulence)।

जिसमें संवहनीय एयर टर्बुलेंस (Convective Turbulence) गरज वाले बादलों और आंधी-तूफान के आसपास तेज हवा के ऊपर-नीचे होने से बनती है। इन बादलों में हवा बहुत तेजी से ऊपर उठती और नीचे आती है, जिससे विमान को तेज झटके लग सकते हैं।

साफ आसमान की एयर टर्बुलेंस (Clear-Air Turbulence) बिना बादलों वाले आसमान में भी हो सकती है। यह आमतौर पर ऊंचाई पर तेज हवाओं और उनकी दिशा या गति में अचानक बदलाव के कारण बनती है। वहीं पर्वतीय तरंग एयर टर्बुलेंस (Mountain-Wave Turbulence) पहाड़ों के आसपास तब बनती है, जब हवा पहाड़ी ढलानों से टकराकर ऊपर की ओर उठती है।

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इस घटना में तूफानी बादलों से पैदा हुए टर्बुलेंस की संभावना

टर्बुलेंस की तीव्रता के आधार पर इसे हल्का (Light), मध्यम (Moderate), तेज (High) और गंभीर (Severe) श्रेणी में रखा जाता है। इस घटना में मौसम की स्थिति को देखते हुए संवहनीय टर्बुलेंस (Convective Turbulence) की संभावना ज्यादा दिखाई देती है। यह टर्बुलेंस आमतौर पर गरज वाले बड़े बादलों और आंधी-तूफान के आसपास बनता है।

बंगाल की खाड़ी के जिस इलाके में यह घटना हुई, वहां पहाड़ नहीं थे। इसलिए पहाड़ों से बनने वाले टर्बुलेंस की संभावना लगभग नहीं थी। इसी तरह उस समय इस रूट पर जेट स्ट्रीम (Jet Stream) का प्रभाव भी प्रमुख नहीं था। इसलिए साफ आसमान वाले टर्बुलेंस की संभावना भी कम मानी जा रही है। गरज वाले बड़े बादलों के अंदर हवा बहुत तेजी से ऊपर और नीचे जाती है। यही तेज हवा विमान को अचानक ऊपर-नीचे या एक तरफ झटका दे सकती है। ऐसे बादलों में ऊपर उठने वाली हवा की गति 80-100 फीट प्रति सेकंड तक हो सकती है।

समस्या यह है कि क्लियर एयर टर्बुलेंस और माउंटेन बेव एयर टर्बुलेंस के लिए कोई स्पष्ट दृश्य संकेत या रडार संकेत (Radar Signature) नहीं होता, इसलिए इन्हें पहले से पकड़ना बेहद मुश्किल होता है। इसके विपरीत, संवहनीय एयर टर्बुलेंस(Convective Turbulence) को पहचानने और उसके खतरे का अनुमान लगाने के लिए कई तरह की मौसम संबंधी सूचनाएं उपलब्ध होती हैं। विमान के क्रू सदस्यों को मानसून के दौरान ऐसी परिस्थितियों से निपटने और उनसे बचने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है।

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विमान का मौसम रडार कैसे करता है मदद?

विमान में लगा मौसम रडार (Onboard Weather Radar) पायलटों को रास्ते में मौजूद खराब मौसम का पता लगाने में मदद करता है। यह रडार (X-Band Radar) विमान की नाक में लगा होता है और सामने मौजूद बारिश और बादलों में पानी की बूंदों से मिलने वाले संकेतों को पढ़ता है। इससे पायलटों को पता चलता है कि आगे भारी बारिश या तूफानी बादल कहां हैं। लेकिन इस रडार की भी कुछ सीमाएं हैं। यह हर तरह के टर्बुलेंस को सीधे नहीं पकड़ सकता। खासकर साफ आसमान में होने वाले टर्बुलेंस (Clear-Air Turbulence) का पता लगाना मुश्किल होता है।

एक और समस्या यह है कि अगर विमान के सामने बहुत शक्तिशाली तूफानी बादल है, तो रडार की तरंगें उस बादल के पीछे ठीक से नहीं पहुंच पातीं। ऐसे में उसके पीछे मौजूद मौसम की सही जानकारी नहीं मिलती। इसलिए पायलटों को मानसून के दौरान बड़े तूफानी बादलों के पीछे के क्षेत्र को भी संभावित जोखिम वाला क्षेत्र मानकर चलना पड़ता है।

पायलटों और मौसम विभाग की जानकारी भी काम आती है

टर्बुलेंस से बचने के लिए पायलटों को सिर्फ विमान के रडार पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। दूसरी उड़ानों के पायलटों से मिलने वाली जानकारी भी काफी महत्वपूर्ण होती है। इसे पायलट रिपोर्ट (PIREP - Pilot Report) कहा जाता है। अगर किसी दूसरे विमान ने उसी रास्ते में तेज टर्बुलेंस महसूस किया है, तो उसकी जानकारी आगे उड़ रहे विमानों तक पहुंचाई जा सकती है।

इसके अलावा EDR (Eddy Dissipation Rate) जैसे आंकड़ों से भी हवा में टर्बुलेंस की तीव्रता का अंदाजा लगाने में मदद मिलती है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि उस रूट पर पहले से पर्याप्त विमान उड़ रहे हों और उनका डेटा उपलब्ध हो।

फुकेत-दिल्ली जैसे रूट में बंगाल की खाड़ी का बड़ा हिस्सा समुद्र के ऊपर से गुजरता है और यहां विमान यातायात कुछ व्यस्त अंतरराष्ट्रीय रूट की तुलना में कम हो सकता है। इसलिए हर जगह पर्याप्त पायलट रिपोर्ट मिलना संभव नहीं होता।

तीसरी महत्वपूर्ण जानकारी मौसम विभाग के विमानन मौसम कार्यालयों से मिलती है। मौसम विभाग खराब मौसम और संभावित खतरे को लेकर एयरलाइंस को चेतावनी और सलाह (Aviation Weather Advisories) भेजता है। एयरलाइंस को ये सूचनाएं अंतरराष्ट्रीय टेलीटाइप नेटवर्क (International Teletype Networks) के जरिए वास्तविक समय में मिलती हैं। यानी पायलटों के पास रडार, दूसरे विमानों की जानकारी और मौसम विभाग की चेतावनी तीनों तरह की जानकारी होती है। फिर भी हर टर्बुलेंस का पहले से पता लगाना संभव नहीं होता। ये तीनों प्रणालियां मिलकर एयर टर्बुलेंस के ज्यादातर खतरों को पकड़ लेती हैं, लेकिन हर बार टर्बुलेंस का पहले से पता लगा लगना संभन नहीं होता है। क्योंकि रडार की अपनी सीमाएं हैं, पायलट रिपोर्ट में आंकड़ों का अंतर हो सकता है और मौसम संबंधी सलाह अक्सर सामान्य प्रकृति की होती है।

मानसून में बंगाल की खाड़ी में उड़ान क्यों चुनौतीपूर्ण?

मानसून के दौरान बंगाल की खाड़ी में बड़े पैमाने पर गरज वाले बादल (Thunderclouds) और तेज संवहनीय गतिविधियां (Convective Cells) बन सकती हैं। समुद्र के ऊपर कई बार ये बादल बहुत बड़े क्षेत्र में फैले होते हैं। ऐसे में पायलटों के लिए इनसे बचते हुए सुरक्षित रास्ता चुनना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

समुद्र के ऊपर उड़ान का एक और बड़ा अंतर यह है कि आपात स्थिति में उतरने के लिए आसपास जमीन पर मौजूद वैकल्पिक हवाई अड्डे (Diversionary Airfields) आसानी से उपलब्ध नहीं होते। इसलिए ऐसे रूट पर मौसम की निगरानी और सही निर्णय लेना बेहद महत्वपूर्ण होता है।

हालांकि, इस तरह की घटना को केवल पायलट या क्रू की लापरवाही मानना सही नहीं होगा। पायलट और पूरा क्रू यात्रियों की सुरक्षा को सबसे ज्यादा प्राथमिकता देते हैं और मौसम से जुड़ी उपलब्ध जानकारी के आधार पर लगातार फैसले लेते हैं। इस मामले में भी अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

डीजीसीए (DGCA) कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (Cockpit Voice Recorder) और फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (Flight Data Recorder) की जानकारी के साथ मौसम की परिस्थितियों और उड़ान के दौरान हुई घटनाओं की जांच कर रहा है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि टर्बुलेंस का मुख्य कारण क्या था और विमान अचानक से 300 फीट की ऊंचाई से नीचे कैसे आ गया।

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AVM GP Sharma
President of Meteorology & Climate Change
AVM Sharma, President of Meteorology & Climate Change at Skymet Weather Services, is a retired Indian Air Force officer who previously led the Meteorological Branch at Air Headquarters in New Delhi. With over a decade of experience at Skymet, he brings a wealth of knowledge and expertise to the organization.
FAQ

4 अगस्त 2026 को फुकेत से दिल्ली आ रही AI2379 उड़ान बंगाल की खाड़ी के ऊपर गंभीर टर्बुलेंस में फंस गई। घटना में 17 लोग घायल हुए और विमान ने करीब 300 फीट ऊंचाई खोई।

उपलब्ध मौसम परिस्थितियों के आधार पर Convective Turbulence की संभावना सबसे अधिक दिखाई देती है, जो गरज वाले बादलों और तेज ऊपर-नीचे की हवाओं से बनता है।

Weather Radar बारिश और Convective Cells की पहचान करने में मदद करता है, लेकिन यह Dry Turbulence और Clear-Air Turbulence को सीधे detect नहीं कर सकता। मजबूत Thunderstorm Cell के पीछे का क्षेत्र भी रडार से छिप सकता है।

डिस्क्लेमर: डिस्कलेमर- यह विश्लेषण स्काइमेट के मौसम संबंधी आंकड़ों, आंतरिक पूर्वानुमान मॉडल, मौसम केंद्रों से प्राप्त जानकारी, जलवायु संबंधी डेटा और स्काइमेट की मौसम विशेषज्ञ टीम के आकलन पर आधारित है। सटीक जानकारी देने का पूरा प्रयास किया गया है, लेकिन मौसम लगातार बदलने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया है, इसलिए परिस्थितियां समय के साथ बदल सकती हैं। यह जानकारी केवल सामान्य सूचना के उद्देश्य से दी गई है और इसे अंतिम या पूरी तरह निश्चित मौसम पूर्वानुमान नहीं माना जाना चाहिए।

Skymet भारत की सबसे बेहतर और सटीक निजी मौसम पूर्वानुमान और जलवायु इंटेलिजेंस कंपनी है, जो देशभर में विश्वसनीय मौसम डेटा, मानसून अपडेट और कृषि जोखिम प्रबंधन समाधान प्रदान करती है