गंगा-यमुना उफान पर, वाराणसी से दिल्ली तक बाढ़ का खतरा, जानें अगले दिनों का हाल
मुख्य मौसम बिंदु
- वाराणसी में गंगा करीब 72.1 मीटर पर पहुंची, जो खतरे के निशान से ऊपर है।
- प्रयागराज में गंगा-यमुना संगम पर 84.73 मीटर के खतरे के निशान के आसपास।
- दिल्ली में यमुना 204.5 मीटर के चेतावनी स्तर और 205.33 मीटर के खतरे के निशान के आसपास।
- लगातार मानसूनी बारिश, बंगाल की खाड़ी के मौसम सिस्टम और ऊपरी बैराजों से पानी छोड़ा जाना।
- पूर्वानुमान वैधता: यह मौसम अपडेट 5 सितंबर 2026 तक मान्य है।
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गंगा और इसके किनारे रहने वाले लोगों का जीवन पीढ़ियों से नदी के एक तय मौसमी चक्र के साथ चलता आया है। लेकिन इस सप्ताह लगातार हो रही मानसूनी बारिश और ऊपरी बैराजों से छोड़े जा रहे पानी ने इस सामान्य स्थिति को बदल दिया है। नदी का जलस्तर इतना बढ़ गया है कि कई जगह लोगों को छतों और ऊंचे स्थानों पर रहने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
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प्रयागराज से वाराणसी और दिल्ली तक नदियां उफान पर
गंगा के मैदानी क्षेत्र में प्रयागराज से वाराणसी होते हुए दिल्ली तक गंगा और यमुना उफान पर हैं। इनके जलग्रहण क्षेत्रों में कई सप्ताह से लगातार मानसूनी बारिश हो रही है। इसके साथ ही ऊपरी बैराजों से भारी मात्रा में पानी छोड़े जाने के कारण कई जिलों में नदियों का जलस्तर लंबे समय के खतरे के निशान को पार कर गया है। इससे घाट पानी में डूब गए हैं, गांवों का संपर्क टूट गया है और हजारों परिवारों को राहत शिविरों में जाना पड़ा है।
वाराणसी में गंगा खतरे के निशान से ऊपर
केंद्रीय जल आयोग यानी CWC के गेज आंकड़ों के अनुसार, वाराणसी में गंगा का जलस्तर करीब 72.1 मीटर तक पहुंच गया है। यहां खतरे का निशान 71.262 मीटर है। यानी नदी खतरे के निशान से काफी ऊपर बह रही है। गंगा का पानी वाराणसी के प्रसिद्ध घाटों को पूरी तरह डुबो चुका है और घाटों को जोड़ने वाले पैदल रास्ते भी पानी में समा गए हैं।
मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर बदली अंतिम संस्कार की व्यवस्था
आमतौर पर मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर नदी के किनारे अंतिम संस्कार किए जाते हैं। लेकिन पानी बढ़ने के कारण अब अंतिम संस्कार ऊंचे प्लेटफॉर्म और छतों पर किए जा रहे हैं।इस मानसून सीजन में यह दूसरी बार है जब ऐसी स्थिति बनी है।
प्रयागराज में गंगा-यमुना संगम पर भी खतरा
प्रयागराज में गंगा और यमुना के पवित्र संगम पर दोनों नदियां अगस्त के आखिर में बार-बार 84.73 मीटर के खतरे के निशान के करीब पहुंचीं और इसे पार भी किया। कुछ समय के लिए जलस्तर नीचे आया, लेकिन नई बारिश के बाद फिर बढ़ गया। जिले के आंकड़ों के अनुसार 200 से ज्यादा गांव और करीब 60 शहरी बस्तियां पानी की चपेट में हैं। झूंसी और जौनपुर के पास एक प्रमुख संपर्क सड़क भी कई फीट पानी में डूब गई है। इससे करीब दो दर्जन गांवों का मुख्य शहर से संपर्क कट गया है। प्रभावित इलाकों के स्कूलों को राहत शिविरों में बदल दिया गया है।
दिल्ली में यमुना का जलस्तर भी चेतावनी स्तर के करीब
दिल्ली में यमुना का जलस्तर 204.5 मीटर के चेतावनी स्तर और 205.33 मीटर के खतरे के निशान के आसपास बना हुआ है। दिल्ली में यमुना के जलस्तर पर स्थानीय बारिश से ज्यादा असर हरियाणा के हथिनीकुंड बैराज से नियंत्रित तरीके से छोड़े गए पानी का है। इससे यह बात सामने आती है कि दिल्ली में बाढ़ का खतरा केवल शहर में हुई बारिश से तय नहीं होता, बल्कि पहाड़ी और ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों की स्थिति भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है।
बाढ़ ने आम जिंदगी को अस्त-व्यस्त कर दिया है। वाराणसी में 6,500 से ज्यादा लोग राहत शिविरों में पहुंचे है। प्रयागराज के निचले इलाकों में दोबारा पानी भरने के कारण परिवारों को अपना सामान फिर से छतों पर पहुंचाना पड़ रहा है। रोजमर्रा की आवाजाही के लिए कई लोग नावों पर निर्भर हैं। कम आय वाले नदी किनारे के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए बार-बार आने वाली बाढ़ का मतलब लगातार विस्थापन और कमाई का नुकसान है। इसका असर नाविकों, घाट पर सामान बेचने वालों, पुजारियों और छोटी दुकानों पर पड़ सकता है। पानी उतरने के बाद भी इन लोगों की आर्थिक परेशानियां लंबे समय तक बनी रह सकती हैं।
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कमजोर मानसून के बावजूद बाढ़ क्यों?
यहां एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है। Skymet के Southwest Monsoon 2026 के मौसमी पूर्वानुमान में पूरे देश के स्तर पर मानसून सामान्य से नीचे रहने की संभावना जताई गई थी। साथ ही मध्य और पश्चिमी भारत में लंबे सूखे दौर का खतरा भी बताया गया था। फिर भी मानसून का कुल आंकड़ा सामान्य से कम होने के बावजूद किसी खास इलाके में खतरनाक बाढ़ आ सकती है। गंगा बेसिन में फिलहाल यही स्थिति दिखाई दे रही है।
इस बाढ़ के पीछे दो प्रमुख कारण है। पहला कारण बंगाल की खाड़ी (BoB) में बनने वाले निम्न दबाव क्षेत्रों और चक्रवाती परिसंचरणों का बार-बार सक्रिय होना है। इन सिस्टमों ने गंगा के मैदानी इलाकों और हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों में कम समय में तेज बारिश कराई है। इसका असर तब भी जारी है जब देश के अन्य बड़े हिस्सों में पूरे सीजन की बारिश सामान्य से कम है।
दूसरा कारण बैराजों से पानी छोड़ा जाना है। दूसरा कारण नदी प्रबंधन से जुड़ा है। यमुना पर स्थित हथिनीकुंड जैसे बैराज सूखे दौर में पानी को नियंत्रित करते हैं और जब जलग्रहण क्षेत्रों में तेजी से पानी भरता है, तो उसे चरणों में छोड़ा जाता है। इसी वजह से दिल्ली में स्थानीय स्तर पर बारिश नहीं होने के बावजूद यमुना का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है। यानी राष्ट्रीय स्तर पर मानसून कमजोर होने के बावजूद किसी एक नदी घाटी में कुछ दिनों की अत्यधिक बारिश और ऊपरी जलप्रवाह बाढ़ की स्थिति पैदा कर सकता है।
अगले कुछ दिनों में कैसा रहेगा नदी का जलस्तर?
वाराणसी में गंगा का जलस्तर अब और ज्यादा बढ़ने की संभावना नहीं है। हालांकि, इसमें तुरंत गिरावट आने की भी उम्मीद नहीं है। जलस्तर कुछ समय तक खतरे के निशान के आसपास या उससे थोड़ा नीचे बना रह सकता है। जब तक पानी घटता नहीं है, तब तक वाराणसी के घाटों के डूबे रहने की संभावना है। वहीं, प्रयागराज में हाई अलर्ट कर दिया गया है। इसके साथ ही प्रयागराज में प्रशासन को लगातार सतर्क रहने की जरूरत है। संगम क्षेत्र में नदी का जलस्तर खतरे के निशान से थोड़ा नीचे आने के बाद फिर से बारिश और ऊपरी क्षेत्र से पानी छोड़े जाने के कारण बढ़ता रहा है। अगले सप्ताह में नदी के जलस्तर में एक बार फिर तेज बढ़ोतरी से इनकार नहीं किया जा सकता है।
दिल्ली-NCR में यमुना फिलहाल स्थिर रहने की संभावना
दिल्ली और NCR में यमुना का जलस्तर कुछ समय तक मौजूदा स्तर के आसपास बने रहने की संभावना है। पश्चिमी हिमालय में भारी बारिश की उम्मीद नहीं है। इसलिए ऊपरी क्षेत्रों से यमुना में आने वाले पानी में बड़ी वृद्धि की संभावना फिलहाल कम है। इससे दिल्ली में नदी का जलस्तर अपेक्षाकृत स्थिर रह सकता है। कई इलाकों में बाढ़ का पानी कम होने के बाद भी खतरा बना रहेगा। जमा हुआ पानी जब शहरी कचरे और खेतों से बहकर आने वाले प्रदूषित पानी के साथ मिल जाता है, तो जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इस तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्या अक्सर बाढ़ के सबसे ऊंचे स्तर के दौरान नहीं, बल्कि बाढ़ की स्थिति खत्म होने के बाद अगले दो सप्ताह में ज्यादा बढ़ सकती है।
लोगों के लिए सुरक्षा सलाह
वाराणसी, प्रयागराज और दिल्ली-NCR में यमुना के किनारे निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को बिना जरूरी काम के घाटों, तटबंधों और बाढ़ प्रभावित गलियों के आसपास जाने से बचना चाहिए। अगर जिला प्रशासन या NDRF/SDRF की ओर से निकासी की सलाह जारी की जाती है, तो उसे तुरंत मानना चाहिए। प्रभावित इलाकों में नौका विहार और नदी आधारित पर्यटन से बचना चाहिए, जब तक प्रशासन की ओर से प्रतिबंध हटाने की जानकारी न दी जाए। राहत शिविरों या आंशिक रूप से बाढ़ प्रभावित घरों में रहने वाले लोगों को साफ और सुरक्षित पेयजल तथा स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि जमा हुए बाढ़ के पानी से जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।















