ISRO अलर्ट: शक्तिशाली सोलर फ्लेयर्स से भारतीय सैटेलाइट, संचार सेवाएं प्रभावित, रेडियो ब्लैकआउट का खतरा

By: Arti Kumari | Edited By: Mohini Sharma
Feb 9, 2026, 11:00 PM
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सोलर फ्लेयर्स का असर तेज, फोटो: AI

मुख्य मौसम बिंदु

  • फरवरी में कई शक्तिशाली X-क्लास सोलर फ्लेयर्स (विस्फोट) दर्ज
  • ISRO ने रेडियो ब्लैकआउट की चेतावनी जारी की
  • GPS, HF रेडियो और एविएशन संचार प्रभावित हो सकते हैं
  • सोलर फ्लेयर्स का आम लोगों के लिए सीधा स्वास्थ्य खतरा नहीं

ISRO ने बताया है कि सूर्य के एक सक्रिय हिस्से से बहुत तेज ऊर्जा विस्फोट (सोलर फ्लेयर) हुए हैं। जिसके कारण मजबूत रेडियो ब्लैकआउट की स्थिति बन सकती है। 1 फरवरी 2026 को X8.1 श्रेणी का विस्फोट दर्ज हुआ, जो इस वर्ष का सबसे शक्तिशाली और 1996 के बाद सबसे बड़े फ्लेयर्स में से एक माना जा रहा है। इससे रेडियो सिग्नल और संचार व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

सोलर फ्लेयर क्या होता है?

सोलर फ्लेयर सूर्य की सतह पर अचानक होने वाला जबरदस्त ऊर्जा विस्फोट है। यह सनस्पॉट क्षेत्रों में उलझे हुए चुंबकीय क्षेत्र (magnetic fields) के टूटने और अचानक ऊर्जा छोड़ने से होता है। इस दौरान एक्स-रे, अल्ट्रावायलेट और रेडियो तरंगों के रूप में विकिरण(radiation) प्रकाश की गति से अंतरिक्ष में फैलता है। ये घटनाएं सोलर मैक्सिमम के समय ज्यादा होती हैं, जैसा कि अभी सोलर साइकिल 25 के दौरान देखा जा रहा है। इसका मतलब है फ्लेयर्स सूर्य के एक्टिव दौर में ज्यादा होते हैं और अभी सूर्य उसी एक्टिव फेज में है।

कब-कब हुई तेज गतिविधि, अभी क्या स्थिति है

1 और 2 फरवरी 2026 को सूर्य से कई शक्तिशाली सोलर फ्लेयर्स निकले, जिनमें X-क्लास के बेहद मजबूत फ्लेयर्स शामिल रहे। इन घटनाओं के बाद स्पेस वेदर अलर्ट जारी किए गए और रेडियो ब्लैकआउट व संचार प्रणाली में बाधा की आशंका जताई गई। 3 और 4 फरवरी तक भी गतिविधि जारी रही, क्योंकि बड़ा सनस्पॉट रीजन AR4366 लगातार ऊर्जा छोड़ता रहा। वैज्ञानिक अभी भी इस क्षेत्र पर नजर बनाए हुए हैं क्योंकि आगे और अचानक फ्लेयर्स (विस्फोट) हो सकते हैं।

आगे भी जारी रह सकती है सोलर एक्टिविटी

फिलहाल सोलर गतिविधि ऊंचे स्तर पर बनी हुई है (फरवरी 2026 की शुरुआत तक)। जब तक यह सक्रिय सनस्पॉट क्षेत्र पृथ्वी की ओर मुख किए रहेगा और अस्थिर रहेगा, तब तक आने वाले दिनों में भी तेज सोलर फ्लेयर्स हो सकते हैं। सरल शब्दों में, ये घटनाएं किसी एक तय तारीख तक सीमित नहीं हैं, ये फरवरी की शुरुआत से चल रही हैं और आने वाले दिनों या हफ्तों तक अनियमित रूप से जारी रह सकती हैं।

सटीक समय की भविष्यवाणी संभव नहीं

वैज्ञानिक किसी खास सोलर फ्लेयर के होने का सटीक मिनट या समय पहले से नहीं बता सकते। सूर्य का वातावरण बेहद अशांत और गतिशील होता है, जहां ऊर्जा अचानक बनती और निकलती है। ISRO और NASA जैसी एजेंसियां केवल सक्रिय क्षेत्रों की निगरानी कर सकती हैं और बढ़ी हुई गतिविधि की चेतावनी दे सकती हैं, ताकि स्पेस वेदर के संभावित असर के लिए पहले से तैयारी हो सके।

अब तक के सबसे मजबूत फ्लेयर्स आ चुके, लेकिन खतरा टला नहीं

विशेषज्ञों के अनुसार सबसे शक्तिशाली फ्लेयर्स 1 से 4 फरवरी 2026 के बीच आ चुके हैं, लेकिन स्थिति अभी भी सक्रिय बनी हुई है। इसका मतलब है कि आगे भी नए फ्लेयर्स हो सकते हैं, भले ही उनके लिए कोई निश्चित पूर्वानुमान समय-सीमा नहीं दी जा सकती है।

वैज्ञानिकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं ये फ्लेयर्स?

वैज्ञानिक दृष्टि से सोलर फ्लेयर्स बहुत महत्वपूर्ण डेटा देते हैं। ये सूर्य के मैग्नेटिक सिस्टम और प्लाज्मा की गतिविधियों को समझने में मदद करते हैं। ISRO का आदित्य-L1 मिशन, जो L1 पॉइंट पर स्थित है, ऐसे स्पेस वेदर को मॉनिटर कर रहा है। इनसे कोरोना (solar corona) की हीटिंग और कणों की गति (particle acceleration) के रहस्य समझने में मदद मिलती है, जिससे जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म की भविष्यवाणी बेहतर होती है।

पृथ्वी पर क्या असर: रेडियो, GPS और सैटेलाइट सिग्नल प्रभावित

ये सोलर फ्लेयर्स पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल को आयनाइज कर देते हैं, जिससे HF रेडियो, GPS की सटीकता, सैटेलाइट सिग्नल और एविएशन कम्युनिकेशन प्रभावित हो सकते हैं। उड़ानों और समुद्री नावों की नेविगेशन प्रणाली में अस्थायी ब्लैकआउट हो सकता है। हालांकि पावर ग्रिड और रोजमर्रा के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आमतौर पर सुरक्षित रहते हैं क्योंकि असर ऊपरी वायुमंडलीय स्तर तक सीमित होता है।

ISRO की सैटेलाइट निगरानी और सुरक्षा तैयारी

ISRO अपने 50 से अधिक सैटेलाइट्स की लगातार निगरानी कर रहा है और आपात स्थिति से निपटने के लिए वैकल्पिक योजनाएं तैयार रखी हैं। पहले भी ऐसे सोलर इवेंट्स के दौरान सैटेलाइट की कक्षा में हल्की गिरावट (orbit decay) देखी गई है, लेकिन कोई बड़ा फेल्योर दर्ज नहीं हुआ।

आम लोगों के लिए क्या मतलब है?

सामान्य लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है। ध्रुवीय या ऊंचाई वाले इलाकों में थोड़े समय के लिए रेडियो और GPS में गड़बड़ी हो सकती है। अगर साथ में कोरोनल मास इजेक्शन (CME) भी पृथ्वी की ओर आए तो खूबसूरत ऑरोरा (आसमान में रंगीन रोशनी) दिख सकती है, हालांकि अभी के CME सीधे पृथ्वी की ओर मजबूत तरीके से निर्देशित नहीं हैं। स्वास्थ्य पर कोई सीधा खतरा नहीं है।

तकनीक सामान्य चलेगी, पर संचार में रुकावट संभव

विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर रोजमर्रा की तकनीक सामान्य रूप से काम करती रहेगी। लेकिन अगर आगे भी तेज सोलर फ्लेयर्स और स्पेस वेदर घटनाएं पृथ्वी की ओर आती हैं, तो संचार और नेविगेशन सिस्टम में रुकावट संभव है। ISRO और NASA जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की निगरानी से पहले से चेतावनी मिल जाती है, जिससे महत्वपूर्ण ढांचे और सिस्टम को सुरक्षित रखने में मदद मिलती है।

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Arti Kumari
Content Writer (English)
With a strong foundation in science and a passion for research, Arti specializes in weather and climate communication. At Skymet Weather, she leads the company's digital content strategy, transforming complex meteorological data into clear, engaging narratives. Her research-backed storytelling has helped expand Skymet's digital reach while making weather and climate information accessible to millions of readers across India and beyond.
FAQ

यह सूर्य की सतह पर अचानक होने वाला ऊर्जा विस्फोट है, जिससे तेज विकिरण (radiation) निकलता है।

सोलर फ्लेयर से रेडियो, GPS, सैटेलाइट सिग्नल और उड़ान संचार प्रभावित हो सकते हैं।

सोलर फ्लेयर से जमीन पर रहने वाले लोगों के लिए सीधा खतरा नहीं है।

डिस्क्लेमर: डिस्कलेमर- यह विश्लेषण स्काइमेट के मौसम संबंधी आंकड़ों, आंतरिक पूर्वानुमान मॉडल, मौसम केंद्रों से प्राप्त जानकारी, जलवायु संबंधी डेटा और स्काइमेट की मौसम विशेषज्ञ टीम के आकलन पर आधारित है। सटीक जानकारी देने का पूरा प्रयास किया गया है, लेकिन मौसम लगातार बदलने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया है, इसलिए परिस्थितियां समय के साथ बदल सकती हैं। यह जानकारी केवल सामान्य सूचना के उद्देश्य से दी गई है और इसे अंतिम या पूरी तरह निश्चित मौसम पूर्वानुमान नहीं माना जाना चाहिए।

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