समुद्र का बढ़ता स्तर बना संकट: केरल ने ज्वारीय बाढ़ को "राज्य-विशेष आपदा" क्यों घोषित किया?

By: Arti Kumari | Edited By: Mohini Sharma
Mar 18, 2026, 8:00 AM
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केरल में ज्वारीय बाढ़ को आपदा क्यों माना?

मुख्य बिंदु

  • केरल ने ज्वारीय बाढ़ को “राज्य-विशेष आपदा” घोषित किया
  • प्रभावित लोगों को SDRF से आर्थिक सहायता मिलेगी
  • समुद्र स्तर बढ़ने से समस्या लगातार गंभीर हो रही
  • एर्नाकुलम और अलाप्पुझा सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र

केरल ने आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। 30 जनवरी 2026 को राज्य सरकार ने ज्वारीय बाढ़ (समुद्र के पानी का तटों पर घुसना) को “राज्य-विशेष आपदा” घोषित कर दिया। यह फैसला आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत लिया गया। इसके बाद एर्नाकुलम और अलाप्पुझा जैसे तटीय जिलों में रहने वाले लोगों को राज्य आपदा राहत कोष (SDRF) से आर्थिक मदद मिल सकेगी।

केरल ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। अब ज्वारीय बाढ़ (Tidal Flooding) से होने वाले जान-माल के नुकसान और रोजगार पर असर के लिए प्रभावित लोगों को सहायता दी जाएगी। यह फैसला इस बात को दर्शाता है कि अब यह समस्या छोटी नहीं रही, बल्कि जलवायु परिवर्तन से जुड़ा एक बड़ा खतरा बन चुकी है।

क्या है ज्वारीय बाढ़ (Tidal Flooding)?

ज्वारीय बाढ़ तब होती है जब समुद्र का पानी असामान्य रूप से ऊंची ज्वार (High Tide) के कारण तटीय इलाकों में घुस जाता है। यह भारी बारिश या नदी के उफान की वजह से नहीं, बल्कि समुद्र के जलस्तर बढ़ने से होती है। यह स्थिति आमतौर पर पूर्णिमा या अमावस्या के समय, तेज समुद्री हवाओं या समुद्र के स्तर बढ़ने पर बनती है। अब जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, जिससे ये बाढ़ पहले से ज्यादा बार और ज्यादा क्षेत्रों में देखने को मिल रही है।

केरल के कौन से इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हैं?

केरल के कई तटीय इलाके इस समस्या से लगातार जूझ रहे हैं। एर्नाकुलम और अलाप्पुझा जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। इनमें वायपिन, चेल्लानम, एडाकोची, कुम्बलांगी और कुट्टनाड जैसे क्षेत्र शामिल हैं, जहां जमीन समुद्र स्तर से भी नीचे है।

आंकड़ों के अनुसार, केरल की करीब 10% आबादी (लगभग 35 लाख लोग) किसी न किसी रूप में इस समस्या से प्रभावित है। वहीं 23 तटीय पंचायतों में 20,000 से ज्यादा लोगों के घरों में ज्वार के समय समुद्री पानी घुस जाता है।

ज्वारीय बाढ़ का सामाजिक और आर्थिक असर

यह बाढ़ अचानक नहीं आती, बल्कि बार-बार होती है, जिससे लोगों की जिंदगी पर लगातार असर पड़ता है। आर्थिक रूप से देखें तो मछली पकड़ने, तटीय खेती और छोटे व्यवसायों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है, जिससे लोगों की आय में लगातार गिरावट आ रही है। खारे पानी के कारण खेती की जमीन खराब हो रही है और पारंपरिक फसलें प्रभावित हो रही हैं। साथ ही, घरों के फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक सामान और मछली पकड़ने के उपकरण भी खराब हो जाते हैं, जिससे मरम्मत और बदलाव का खर्च बढ़ता जा रहा है। कई लोग हर साल अपने घरों को ऊंचा करने या पानी से बचाव के उपायों पर भारी खर्च कर रहे हैं, जबकि कई क्षेत्रों में संपत्ति की कीमत भी घट रही है।

सामाजिक प्रभाव की बात करें तो बार-बार बाढ़ आने से लोग अपने घर छोड़कर दूसरे स्थानों पर जाने को मजबूर हो रहे हैं, जिससे जलवायु प्रवास (Climate Migration) बढ़ रहा है। खारे पानी के जमाव से बीमारियों का खतरा बढ़ता है और पीने के पानी की गुणवत्ता भी खराब हो रही है। लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है, क्योंकि उन्हें हर समय ज्वार के अनुसार अपनी दिनचर्या बदलनी पड़ती है। लगातार खतरे के माहौल में रहने से मानसिक तनाव और चिंता भी बढ़ रही है, खासकर गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है।

समुदाय की भूमिका: EQUINOCT की पहल

केरल में EQUINOCT नाम की संस्था इस समस्या से निपटने में अहम भूमिका निभा रही है। यह संस्था 2018 की बाढ़ के बाद शुरू हुई थी और स्थानीय लोगों को “सिटीजन साइंटिस्ट” बनाकर डेटा इकट्ठा करने में मदद करती है।

EQUINOCT की पहल के तहत 10,000 से ज्यादा घरों को ज्वार कैलेंडर दिए गए हैं, जिनमें लोग बाढ़ के समय, अवधि और पानी की गहराई का रिकॉर्ड रखते हैं। कई गांवों में साधारण उपकरणों के जरिए पानी का स्तर मापा जा रहा है। इसके साथ ही, कुदुम्बश्री के सहयोग से करीब 25 तटीय क्षेत्रों में बाढ़ प्रभावित इलाकों की मैपिंग की गई है। 2024 में लॉन्च किए गए “Gather” ऐप के जरिए अब रियल-टाइम डेटा प्रशासन तक पहुंचाया जा रहा है। खास बात यह है कि इस पहल में करीब 90% महिलाएं शामिल हैं, जिससे डेटा की सटीकता और निरंतरता बढ़ी है।

केरल में ज्वारीय बाढ़ क्यों बढ़ रही है?

इसके पीछे कई कारण हैं। जलवायु परिवर्तन के चलते समुद्र का स्तर लगातार बढ़ रहा है, जिससे ऊंची ज्वार के समय पानी पहले से ज्यादा अंदर तक पहुंच रहा है। मौसम में बदलाव भी इस समस्या को और गंभीर बना रहा है।

स्थानीय स्तर पर देखें तो केरल के कई तटीय इलाके, जैसे कुट्टनाड, समुद्र स्तर से नीचे हैं और जमीन धीरे-धीरे धंस भी रही है, जिससे बाढ़ का खतरा और बढ़ जाता है।

मानव गतिविधियों ने भी इस स्थिति को बिगाड़ा है। नदियों और झीलों में गाद भरने से पानी की निकासी कम हो गई है। इसके अलावा, अनियोजित निर्माण और अतिक्रमण ने प्राकृतिक जल प्रवाह को बाधित किया है। तटीय कटाव और तूफान भी इस समस्या को और बढ़ा रहे हैं।

लंबे समय के समाधान क्या हैं?

केरल सरकार इस समस्या से निपटने के लिए कई कदम उठा रही है। तटीय इलाकों की सुरक्षा के लिए मैंग्रोव जैसे प्राकृतिक उपायों को बढ़ावा दिया जा रहा है और निर्माण कार्यों को नियंत्रित किया जा रहा है। साथ ही, नदियों की सफाई और ड्रेनेज सिस्टम को मजबूत किया जा रहा है ताकि पानी की निकासी बेहतर हो सके।

भविष्य में समुद्र स्तर बढ़ने की संभावना को ध्यान में रखते हुए शहरी योजना बनाई जा रही है। इसके अलावा, लोगों को जागरूक करने, शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने और सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि इस खतरे से प्रभावी तरीके से निपटा जा सके।

निष्कर्ष: बढ़ता खतरा, जरूरी तैयारी

केरल का यह फैसला दिखाता है कि ज्वारीय बाढ़ अब एक गंभीर और स्थायी खतरा बन चुकी है। समुद्र का स्तर धीरे-धीरे बढ़ रहा है, लेकिन इसका असर तुरंत लोगों की जिंदगी पर पड़ रहा है। ऐसे में बेहतर योजना, तकनीक और लोगों की भागीदारी से ही इस समस्या से निपटा जा सकता है।

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Arti Kumari
Content Writer (English)
With a strong foundation in science and a passion for research, Arti specializes in weather and climate communication. At Skymet Weather, she leads the company's digital content strategy, transforming complex meteorological data into clear, engaging narratives. Her research-backed storytelling has helped expand Skymet's digital reach while making weather and climate information accessible to millions of readers across India and beyond.
FAQ

यह समुद्र के ऊंचे ज्वार के कारण तटीय इलाकों में पानी घुसने की स्थिति है।

क्योंकि यह समस्या बार-बार हो रही है और लोगों की जिंदगी व आजीविका पर असर डाल रही है।

अब प्रभावित लोगों को राज्य आपदा राहत कोष (SDRF) से आर्थिक मदद मिल सकेगी।

डिस्क्लेमर: डिस्कलेमर- यह विश्लेषण स्काइमेट के मौसम संबंधी आंकड़ों, आंतरिक पूर्वानुमान मॉडल, मौसम केंद्रों से प्राप्त जानकारी, जलवायु संबंधी डेटा और स्काइमेट की मौसम विशेषज्ञ टीम के आकलन पर आधारित है। सटीक जानकारी देने का पूरा प्रयास किया गया है, लेकिन मौसम लगातार बदलने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया है, इसलिए परिस्थितियां समय के साथ बदल सकती हैं। यह जानकारी केवल सामान्य सूचना के उद्देश्य से दी गई है और इसे अंतिम या पूरी तरह निश्चित मौसम पूर्वानुमान नहीं माना जाना चाहिए।

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