मानसून 2026 पर दोहरी चेतावनी: स्काईमेट के बाद सरकारी मौसम एजेंसी ने भी बताया ‘सामान्य से कम’ बारिश का अनुमान
मुख्य मौसम बिंदु
- मानसून 2026 ‘सामान्य से कम’ रहने का अनुमान
- स्काईमेट (94%) और सरकारी एजेंसी (92%) में मामूली अंतर
- बारिश का समय और वितरण ज्यादा महत्वपूर्ण
- अल-नीनो, IOD और MJO से बढ़ती अनिश्चितता
स्काईमेट वेदर ने 7 अप्रैल 2026 को ने दक्षिण-पश्चिम मानसून का विस्तृत पूर्वानुमान जारी किया था। जिसमें जून से सितंबर तक के पूरे सीजन में बारिश ‘सामान्य से कम’ रहने की संभावना जताई थी। इसके तुरंत बाद राष्ट्रीय मौसम विभाग(IMD) ने भी अपना पहला अनुमान जारी किया और उसने भी मानसून को “सामान्य से कम” बताया।
बारिश के प्रतिशत में मामूली अंतर, लेकिन चिंता नहीं
दोनों एजेंसियों के अनुमान लगभग समान हैं, बस 2% का अंतर है। स्काईमेट के अनुसार बारिश 94% (LPA) रहेगी, जबकि दूसरी एजेंसी के अनुसार यह 92% होगी। यह अंतर बहुत छोटा है और इसे लेकर ज्यादा चिंता की ज़रूरत नहीं है। यह अंतर अलग-अलग मॉडल, गणनाओं और शुरुआती स्थितियों के कारण होता है।
बारिश का समय और वितरण ज्यादा अहम
सिर्फ कुल बारिश का प्रतिशत ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि बारिश कब और कहां होती है। अगर 6-8% तक की कमी भी हो, लेकिन बारिश सही समय और समान रूप से हो जाए, तो बड़ी समस्या नहीं होती। खासकर जुलाई और अगस्त महीने सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि ये मुख्य मानसून के महीने हैं। मध्य और पूर्वी भारत के वर्षा आधारित क्षेत्रों में अगर गर्मी और सूखा बढ़ता है, तो मिट्टी की नमी घटती है और भूजल स्तर नीचे चला जाता है।
अल-नीनो, IOD और MJO जैसे कारक बनाते हैं पूर्वानुमान जटिल
अल-नीनो (El Niño) एक समुद्र और वातावरण से जुड़ी प्रक्रिया है, जो बार-बार होती है, लेकिन पिछले कुछ सालों में इसके पैटर्न बदल गए हैं। अब अल-नीनो और ला-नीना की आवृत्ति पहले जैसी नियमित नहीं रही है। मानसून का अनुमान अक्सर अल-नीनो पर आधारित होता है, जो पूरी तरह पर्याप्त नहीं है। इसके प्रकार का भी जिक्र नहीं होता, जो जरूरी है।
इसके अलावा Indian Ocean Dipole (IOD) भी मानसून को प्रभावित करता है। 2019 में पॉजिटिव IOD ने अल-नीनो के असर को कम कर दिया था। वहीं Madden-Julian Oscillation (MJO) एक ऐसा मौसमी सिस्टम है, जो 40-60 दिनों के चक्र में आता है और पूरे सीजन में सिर्फ 1-2 बार ही सक्रिय होता है। इसकी अनिश्चितता काफी ज्यादा होती है।
मानसून एक बहुत बड़ा और जटिल सिस्टम है, जिसमें कई ऊर्जा और प्रक्रियाएं शामिल होती हैं, इसलिए इसे पूरी तरह समझना आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।





