कर्नाटक में 22% बारिश की कमी, सूखे से राहत के लिए क्लाउड सीडिंग अभियान शुरू

By: AVM GP Sharma | Edited By: Mohini Sharma
Aug 25, 2026, 5:45 PM
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कर्नाटक में क्लाउड सीडिंग

मुख्य मौसम बिंदु

  • कर्नाटक में सूखा प्रभावित क्षेत्रों में क्लाउड सीडिंग अभियान।
  • 1 जून से 24 अगस्त 2026 के बीच राज्य में करीब 22% बारिश की कमी।
  • अगले 1-2 सप्ताह में दक्षिणी प्रायद्वीप में बारिश की परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं
  • क्लाउड सीडिंग की सफलता उपयुक्त, पर्याप्त नमी वाले और सही संरचना के बादलों की उपलब्धता पर निर्भर करती है।
  • पूर्वानुमान वैधता: अगले 1-2 सप्ताह में मौसम की परिस्थितियां क्लाउड सीडिंग के लिए चुनौतीपूर्ण रह सकती हैं, सरकारी अभियान 60 दिनों तक, अक्टूबर तक जारी रहने की योजना है।

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कर्नाटक सरकार ने सूखे और बारिश की कमी से प्रभावित इलाकों में क्लाउड सीडिंग यानी कृत्रिम बारिश कराने की प्रक्रिया को मंजूरी दे दी है। इसके लिए प्रशासनिक स्वीकृति मिल चुकी है और लगभग 28 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। यह अभियान 60 दिनों तक चलेगा और तुरंत शुरू होकर अक्टूबर महीने तक जारी रह सकता है। क्लाउड सीडिंग का उद्देश्य मौजूदा बादलों से बारिश कराने की संभावना बढ़ाना है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि किसी भी समय या साफ आसमान में बारिश कराई जा सकती है।

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कर्नाटक पहले भी 2003, 2009, 2017, 2019 और 2020 में क्लाउड सीडिंग के प्रयोग कर चुका है। राज्य में किए गए वैज्ञानिक आकलनों में स्थानीय स्तर पर बारिश में शुद्ध सकारात्मक बढ़ोतरी देखी गई है, लेकिन परिणाम हर बार एक जैसे नहीं रहे। इसकी सफलता उस समय मौजूद वातावरण और बादलों की प्रकृति पर निर्भर करती है। पिछले प्रयोगों से यह संकेत भी मिला है कि ग्लेशियोजेनिक सीडिंग, यानी ठंडे बादलों को लक्ष्य बनाकर की जाने वाली सीडिंग, गर्म बादलों को लक्ष्य बनाने वाली हाइग्रोस्कोपिक सीडिंग की तुलना में बेहतर परिणाम दे सकती है। इसलिए क्लाउड सीडिंग सूखे से निपटने का एक उपयोगी विकल्प हो सकती है, लेकिन इसे निश्चित रूप से बारिश कराने वाली तकनीक नहीं माना जा सकता।

कर्नाटक में 22% बारिश की कमी, 31 में से 29 जिले बारिश की कमी वाले

इस साल कर्नाटक में 1 जून से 24 अगस्त 2026 के बीच करीब 22% बारिश की कमी दर्ज की गई है। दक्षिण आंतरिक कर्नाटक और तटीय कर्नाटक, दोनों में मौसमी बारिश की कमी करीब 24% है। उत्तर आंतरिक कर्नाटक की स्थिति कुछ बेहतर है, जहां बारिश की कमी करीब 15% है। चार समरूप मौसम क्षेत्रों में दक्षिणी प्रायद्वीप में 22% की दूसरी सबसे बड़ी बारिश कमी दर्ज हुई है।

दक्षिणी प्रायद्वीप में आंध्र प्रदेश की स्थिति सबसे खराब है, जहां मौसमी बारिश की कमी करीब 39% है। वहीं कर्नाटक में स्थिति को जिलेवार देखें तो राज्य के 31 में से 29 जिले बारिश की कमी वाले आंके गए हैं। ऐसे में सरकार के लिए क्लाउड सीडिंग जैसे वैकल्पिक उपायों की मदद लेना महत्वपूर्ण हो गया है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि अभियान के दौरान पर्याप्त और उपयुक्त बादल उपलब्ध होते हैं या नहीं।

हर बादल से कृत्रिम बारिश संभव नहीं, खास तरह के बादल जरूरी

क्लाउड सीडिंग की सफलता सबसे पहले उपयुक्त बादलों की उपलब्धता पर निर्भर करती है। वातावरण लगातार बदलता रहता है, इसलिए केवल बादल दिखाई देना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए ऐसे ऊंचे और पर्याप्त घने बादल चाहिए जिनमें पानी की बूंदें मौजूद हों, भले ही उनका आकार छोटा हो। प्राकृतिक बारिश आमतौर पर उन बादलों से होती है जिनमें पानी की बूंदें बड़ी हो जाती हैं। जब बादल काफी मोटे और गहरे हों तथा बूंदें बड़ी हों, तो प्राकृतिक रूप से बारिश होने लगती है। ऐसे समय पर क्लाउड सीडिंग कराने का फायदा बहुत कम हो सकता है।

दूसरी ओर, छोटे आकार की बूंदों वाले बादलों में बूंदों के आपस में टकराने और जुड़ने यानी collision और coalescence की प्रक्रिया पर्याप्त रूप से नहीं हो पाती। परिणामस्वरूप छोटी बूंदें जमीन तक पहुंचने से पहले ही वाष्पित हो सकती हैं। यदि बादल बहुत उथले हों या वातावरण सूखा हो, तो सीडिंग प्रभावी नहीं होगी। इसलिए क्लाउड सीडिंग के लिए बादलों का सही चयन जरूरी है। आम तौर पर ऊर्ध्वाधर रूप से विकसित हो रहे क्यूम्यलस बादल या नमी की पर्याप्त मात्रा वाली मोटी मध्यम ऊंचाई की बादलों की परत इसके लिए बेहतर मानी जाती है।

अगले 1-2 सप्ताह चुनौतीपूर्ण, क्लाउड सीडिंग की सफलता पर भी सवाल

फिलहाल मौसम की परिस्थितियां दक्षिणी प्रायद्वीप में व्यापक प्राकृतिक बारिश के लिए अनुकूल नहीं हैं, और इसमें कर्नाटक भी शामिल है। अगले एक से दो सप्ताह के दौरान उपयुक्त बादल बार-बार मिलना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। राज्य का उत्तरी आधा हिस्सा वातावरण में नमी की कमी के कारण अधिक संवेदनशील बना हुआ है। इसलिए सरकार के 60 दिन के क्लाउड सीडिंग अभियान के बावजूद तत्काल और व्यापक बारिश की गारंटी नहीं दी जा सकती।

क्लाउड सीडिंग की प्रभावशीलता लंबे समय से वैज्ञानिक बहस और शोध का विषय रही है। इसका परिणाम वातावरण, बादलों की ऊंचाई, नमी, तापमान और अन्य मौसमी परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए क्लाउड सीडिंग को सूखे से राहत देने का एक संभावित साधन जरूर माना जा सकता है, लेकिन इसे मानसूनी बारिश का विकल्प नहीं माना जा सकता। कर्नाटक में आने वाले दिनों में इसकी वास्तविक सफलता मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करेगी कि अभियान को कितने उपयुक्त और सीडिंग के योग्य बादल मिलते हैं। यह भी पढ़ें: मानसून 2026 का पूर्वानुमान रिवाइज्ड: सामान्य से 15% कम बारिश के आसार, सूखे की आशंका बढ़ी

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AVM GP Sharma
President of Meteorology & Climate Change
AVM Sharma, President of Meteorology & Climate Change at Skymet Weather Services, is a retired Indian Air Force officer who previously led the Meteorological Branch at Air Headquarters in New Delhi. With over a decade of experience at Skymet, he brings a wealth of knowledge and expertise to the organization.
FAQ

कर्नाटक में बारिश की कमी और सूखे जैसी परिस्थितियों को देखते हुए सरकार क्लाउड सीडिंग के जरिए उपयुक्त बादलों से बारिश कराने की संभावना बढ़ाना चाहती है।

नहीं, इसकी सफलता पूरी तरह वातावरण और उपयुक्त बादलों की उपलब्धता पर निर्भर करती है। साफ आसमान, बहुत सूखे या बहुत कम ऊंचाई वाले बादलों में यह तकनीक प्रभावी नहीं होती।

1 जून से 24 अगस्त 2026 के बीच कर्नाटक में करीब 22% मौसमी बारिश की कमी रही है। राज्य के 31 में से 29 जिले बारिश की कमी वाले आंके गए हैं।

डिस्क्लेमर: डिस्कलेमर- यह विश्लेषण स्काइमेट के मौसम संबंधी आंकड़ों, आंतरिक पूर्वानुमान मॉडल, मौसम केंद्रों से प्राप्त जानकारी, जलवायु संबंधी डेटा और स्काइमेट की मौसम विशेषज्ञ टीम के आकलन पर आधारित है। सटीक जानकारी देने का पूरा प्रयास किया गया है, लेकिन मौसम लगातार बदलने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया है, इसलिए परिस्थितियां समय के साथ बदल सकती हैं। यह जानकारी केवल सामान्य सूचना के उद्देश्य से दी गई है और इसे अंतिम या पूरी तरह निश्चित मौसम पूर्वानुमान नहीं माना जाना चाहिए।

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